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Temple Visit Rituals : भगवान के दर्शन के बाद सीढ़ी पर बैठने का नियम क्यों है, जानिए इसके पीछे की आस्था

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Temple Visit Rituals : भारत की संस्कृति में मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आत्मशांति और आत्मचिंतन का केंद्र माने जाते हैं।

हम सभी कभी न कभी मंदिर में दर्शन करने जरूर जाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दर्शन के बाद कई लोग मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ देर बैठ क्यों जाते हैं?

यह केवल आराम करने की बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक कारण छिपा है।

सीढ़ियों पर बैठने की परंपरा का असली अर्थ

प्राचीन ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि मंदिर की पैड़ी या सीढ़ियाँ सिर्फ आने-जाने का मार्ग नहीं, बल्कि ध्यान और साधना का स्थान थीं। दर्शन के बाद कुछ देर वहीं बैठकर मन को स्थिर करना और भगवान का स्मरण करना परंपरा का हिस्सा था।

माना जाता है कि इस समय व्यक्ति के भीतर की ऊर्जा शांत होती है और भगवान के दर्शन का प्रभाव गहराई से आत्मा में उतरता है।

मंदिर की सीढ़ियों पर क्या नहीं करना चाहिए

आज के समय में देखा जाता है कि लोग मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर आपस में घर, व्यापार या राजनीति की बातें करने लगते हैं। यह गलत माना गया है।

शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि सीढ़ियों पर बैठना ‘मौन ध्यान’ और ‘मनन’ का प्रतीक है, इसलिए वहाँ सांसारिक चर्चाएँ नहीं करनी चाहिए। यह स्थान ईश्वरीय ऊर्जा का केंद्र होता है, जहाँ केवल भगवान का स्मरण और आत्मचिंतन ही करना चाहिए।

दर्शन के बाद मंत्र जप का महत्व

कहा जाता है कि मंदिर से बाहर निकलने के बाद पैड़ी पर बैठकर यह श्लोक पढ़ना अत्यंत शुभ होता है –
“अनायासेन मरणम्, बिना देन्येन जीवनम्। देहान्ते तव सान्निध्यं, देहि मे परमेश्वरम्॥”

इसका भावार्थ है कि हमारी मृत्यु बिना किसी कष्ट के हो, हमारा जीवन किसी पर निर्भर हुए बिना बीते और जब मृत्यु हो तो भगवान के सान्निध्य में हमारे प्राण निकलें।

इस मंत्र का जप हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में सांसारिक इच्छाओं से अधिक ईश्वर का साक्षात्कार महत्वपूर्ण है। धन, मान-सम्मान, या पद की याचना करने के बजाय हमें मानसिक शांति और मोक्ष की प्रार्थना करनी चाहिए।

दर्शन के बाद कैसे करें ध्यान

दर्शन करते समय आंखें खुली रखकर भगवान के स्वरूप, चरण और श्रृंगार का आनंद लेना चाहिए। वहीं, जब आप मंदिर से बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठें, तब आंखें बंद करके ध्यान करें। भगवान का स्वरूप मन में बसाने का यही सर्वोत्तम समय होता है।

अगर ध्यान करते समय भगवान का चेहरा मन में न आए, तो दोबारा दर्शन करें और पुनः ध्यान लगाएं। यह अभ्यास धीरे-धीरे मन को स्थिर और शांत बनाता है।

सीढ़ियों पर बैठने की परंपरा का जीवन में प्रभाव

यह परंपरा केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी है। जब हम मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ पल शांति से बैठते हैं, तो मन की अशांति दूर होती है, तनाव घटता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

बुजुर्ग कहते हैं — “मंदिर में आंखें खोलकर देखना और बाहर बैठकर आंखें बंद करना — यही सच्चे दर्शन की पहचान है।”

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