देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में सियासी पारा चरम पर है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की एक विवादित टिप्पणी ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। पूर्व विधायकों को लेकर दिए गए उनके बयान पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने मोर्चा खोलते हुए इसे देवभूमि की संस्कृति का अपमान बताया है।
गोदियाल ने रविवार को सोशल मीडिया के जरिए महेंद्र भट्ट पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जैसे गरिमामय पद पर बैठे व्यक्ति की भाषा शैली अमर्यादित है। गोदियाल के मुताबिक, भट्ट जब भी सार्वजनिक मंचों पर बोलते हैं, तो अपनी पार्टी के संस्कारों का ही परिचय देते हैं। उन्होंने नसीहत दी कि भट्ट को कम से कम अपने पद की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए।
विवाद की जड़ महेंद्र भट्ट का वह बयान है जिसमें उन्होंने कांग्रेस में जाने वाले या निकाले गए नेताओं के लिए ‘निकाला हुआ माल’ शब्द का प्रयोग किया था। गोदियाल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि जिन पूर्व विधायकों ने सदन की गरिमा बढ़ाई, उनके लिए ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल करना शर्मनाक है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भट्ट स्वयं आज भी उसी सदन में पहुंचने के लिए लालायित हैं, जिसके सदस्यों का वे अपमान कर रहे हैं।
चौतरफा घिरने और सोशल मीडिया पर ट्रोल होने के बाद महेंद्र भट्ट ने अपने बयान पर सफाई पेश की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके शब्दों का गलत अर्थ निकाला गया। भट्ट के अनुसार, उनका आशय उन लोगों से था जिन्हें अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार के कारण भाजपा से बाहर का रास्ता दिखाया गया था। उन्होंने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष की ‘द्विअर्थी सोच’ की वजह से इस मुद्दे को तूल दिया जा रहा है।
इस जुबानी जंग के बीच महेंद्र भट्ट ने एक बड़ा राजनीतिक दावा भी कर दिया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में जल्द ही एक बड़ी टूट होने वाली है और विपक्षी दल के कई कद्दावर नेता भाजपा के संपर्क में हैं। भट्ट ने जोर देकर कहा कि संगठन विस्तार का काम जारी है और मिशन 2027 के तहत भाजपा राज्य में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
उत्तराखंड की राजनीति में दलबदल का इतिहास पुराना रहा है। साल 2016 के सियासी संकट के दौरान भी नौ कांग्रेसी विधायकों ने बगावत कर भाजपा का दामन थामा था, जिसने राज्य की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल दिया था। अब 2027 के चुनाव से पहले ‘निकाला हुआ माल’ जैसे शब्द इसी दलबदल की कड़वाहट को फिर से सतह पर ले आए हैं।









