पिथौरागढ़, 20 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में स्थित प्रसिद्ध अस्कोट वन्यजीव अभ्यारण्य (Askot Wildlife Sanctuary) के जंगलों में पिछले 24 घंटों से भीषण आग (Uttarakhand Forest Fire) लगी हुई है। आग की लपटें इतनी विकराल हैं कि कई हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो चुका है। यह क्षेत्र विशेष रूप से उत्तराखंड के राज्यीय पशु, दुर्लभ कस्तूरी मृग के संरक्षण के लिए आरक्षित है, जिस कारण इस वनाग्नि ने पर्यावरणविदों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
तेज हवाओं ने बढ़ाई मुश्किल
अभ्यारण्य के कोली कन्याल क्षेत्र में लगी यह आग रविवार को तेजी से फैली। चीड़ और बांज के सूखे पत्तों ने ईंधन का काम किया और तेज हवाओं के चलते लपटें एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी तक पहुंच गईं। स्थानीय निवासी गुड्डू परिहार के अनुसार, शनिवार शाम से शुरू हुई यह आग लगातार बढ़ती जा रही है और पहाड़ियों से उठने वाला धुआं कई किलोमीटर दूर से देखा जा सकता है।
दुर्लभ वन्यजीवों पर संकट
अस्कोट अभ्यारण्य न केवल कस्तूरी मृग, बल्कि हिम तेंदुआ (Snow Leopard), हिमालयी भालू और पक्षियों की कई दुर्लभ प्रजातियों का घर है। आग के कारण इन वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं, जिससे वे रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर सकते हैं या आग की चपेट में आ सकते हैं।
दुर्गम भूगोल और राहत कार्य
वन क्षेत्राधिकारी पूरन सिंह देउपा ने बताया कि सूचना मिलते ही विभाग की टीमें मौके पर तैनात कर दी गई हैं। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और ऊंची ढलानों के कारण आग बुझाने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। लगातार चल रही तेज हवाएं आग को बुझाने के प्रयासों में बाधा डाल रही हैं।
चंपावत के बाराकोट में भी मची तबाही
वनाग्नि का प्रकोप केवल पिथौरागढ़ तक सीमित नहीं है। चंपावत जिले के बाराकोट ब्लॉक के डोबाभागू, गल्लागांव और तड़ाग क्षेत्रों में भी शनिवार रात भीषण आग भड़क उठी। यहां प्रभारी अग्निशमन अधिकारी हंसराज सागर के नेतृत्व में दमकल और वन विभाग की टीमों ने मोर्चा संभाला। रात करीब एक बजे तक चली कड़ी मशक्कत के बाद यहां की आग पर काबू पाया जा सका, लेकिन तब तक काफी वन संपदा को नुकसान पहुंच चुका था।
आगामी चुनौती
बढ़ता तापमान और शुष्क मौसम आने वाले दिनों में वनाग्नि की घटनाओं को और अधिक संवेदनशील बना सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अस्कोट जैसे संरक्षित क्षेत्रों में आग पर तुरंत पूरी तरह काबू नहीं पाया गया, तो दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण अभियान वर्षों पीछे चला जाएगा।









