देहरादून, 5 अगस्त 2026 (दून हॉराइज़न)।
Uttarakhand BJP Survey : उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सत्ताधारी दल के भीतर टिकट कटने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। भाजपा के एक आंतरिक सर्वे में 32 मौजूदा विधायकों के टिकट पर खतरे की बात सामने आई है। कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने इस राजनीतिक घटनाक्रम पर सीधा प्रहार किया है। उन्होंने भाजपा की इस कवायद को सीधे तौर पर जनता के भारी गुस्से का परिणाम करार दिया है।
दसौनी ने आंतरिक सर्वे की जरूरत पर ही गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से पूछा है कि अगर राज्य सरकार और उसके विधायकों का काम पिछले पांच सालों में इतना ही बेहतरीन रहा है, तो उन्हें अपने ही लोगों के खिलाफ गुपचुप तरीके से सर्वे क्यों करवाना पड़ रहा है। यह पूरी स्थिति सत्ताधारी खेमे के भीतर व्याप्त घबराहट और अविश्वास को दर्शाती है। पार्टी नेतृत्व अब चुनाव में किसी भी तरह अपनी साख बचाने के लिए केवल जीत की गारंटी वाले नए चेहरों की तलाश कर रहा है।
इन 32 विधायकों को लेकर कांग्रेस ने एक तार्किक सवाल जनता के सामने रखा है। पिछले पांच वर्षों तक भाजपा इन्हीं चेहरों को अपने-अपने क्षेत्रों में विकास के सबसे बड़े मॉडल के रूप में पेश करती रही है। चुनाव नजदीक आते ही अचानक इतने बड़े पैमाने पर विधायकों का खराब साबित होना सरकार के अपने पुराने दावों की पोल खोलता है। सत्ताधारी दल अब अपने ही विकास के चेहरों से किनारा करने की जल्दबाजी में नजर आ रहा है।
कांग्रेस प्रवक्ता ने इस राजनीतिक संकट को केवल विधायकों तक सीमित नहीं माना। उन्होंने इसे सीधे तौर पर भाजपा सरकार के पूरे पांच साल के कार्यकाल पर जनता के भरोसे का गहराता संकट बताया है। दसौनी ने एक बेहद आक्रामक दावा करते हुए कहा कि खुद राज्य के मुखिया की सीट भी अब उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गई है। सत्ताधारी संगठन पूरी ताकत के साथ मुख्यमंत्री के लिए एक बिल्कुल नई और सुरक्षित विधानसभा सीट खोजने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है।
उम्मीदवारों के चेहरे बदलने की इस रणनीति से जनता के मूल मुद्दे खत्म नहीं होंगे। दसौनी ने जोर देकर कहा कि राज्य का आम नागरिक आसमान छूती महंगाई और बेलगाम होती बेरोजगारी की सीधी मार झेल रहा है। उत्तराखंड में एक के बाद एक सामने आए भर्ती घोटालों ने लाखों युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। नए चेहरों और लुभावने वादों के पीछे इन ज्वलंत समस्याओं को किसी भी कीमत पर छिपाया नहीं जा सकता है।
पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन, चरमराती कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के मुद्दे सीधे तौर पर सरकार की जवाबदेही तय करते हैं। सत्ताधारी दल चाहे जितने भी उम्मीदवारों को चुनाव मैदान से हटा दे, लोग इन सवालों का जवाब वोटिंग मशीन पर जरूर मांगेंगे। केवल प्रत्याशी बदल देने से पिछले पांच साल के शासन की भारी कमजोरियों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता।
मौजूदा विधायकों के धड़ल्ले से टिकट काटना पूरी तरह से सत्ता-विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) को मैनेज करने का एक पुराना राजनीतिक हथकंडा है। दसौनी के अनुसार, इस हताश कदम से यह साफ तौर पर प्रमाणित हो जाता है कि भाजपा आलाकमान को जनता के भीतर पनप रहे भारी आक्रोश का सटीक अंदाजा लग चुका है। यह केवल 32 विधायकों पर लटकती तलवार का मामला नहीं है। यह असल में सरकार की जनविरोधी नीतियों पर मंडराता हुआ वास्तविक खतरा है।
कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट किया है कि उसे सत्ताधारी दल के विधायकों के टिकट कटने से कोई राजनीतिक खुशी नहीं मिल रही है। मुख्य विपक्षी दल होने के नाते उनकी चिंता केवल उत्तराखंड की जनता से जुड़े बुनियादी और जमीनी मुद्दों को लेकर है। भाजपा अपनी संभावित चुनावी हार को टालने के लिए चेहरे बदलने की कवायद कर रही है। राज्य का मतदाता अब पूरी तरह से इस सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने का मन बना चुका है।









