दून हॉराइज़न, देहरादून (18 सितंबर) : पर्वतीय और दूरदराज के क्षेत्रों तक आधुनिक चिकित्सा तकनीक को पहुंचाने की दिशा में उत्तराखंड सरकार ने एक नया कदम बढ़ाया है। चंपावत जिले के टनकपुर उप जिला चिकित्सालय और बनबसा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित निवारक स्वास्थ्य कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ कर दिया गया है।
गुजरात और आंध्र प्रदेश के बाद इस आधुनिक तकनीक को अपनाने वाला उत्तराखंड देश का तीसरा राज्य बन गया है। खास बात यह है कि किसी हिमालयी और अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे जिले में इस तरह की परियोजना की यह पहली शुरुआत है, जिससे सीमावर्ती इलाकों के आम नागरिकों को त्वरित स्वास्थ्य लाभ मिलने की उम्मीद बंध गई है।
एक मिनट से कम समय में पूरी होती है फेशियल स्कैनिंग
इस अनूठी पहल के तहत अत्याधुनिक एआई फेशियल स्कैन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो महज एक मिनट के भीतर शरीर और स्वास्थ्य से जुड़े 28 प्रमुख संकेतकों को परख लेती है। इसके साथ ही पारंपरिक और डिजिटल उपकरणों के जरिए ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, हीमोग्लोबिन, बॉडी कंपोजीशन, पल्मोनरी फंक्शन, ईसीजी, ऑक्सीजन सैचुरेशन (SpO2) और बॉडी टेम्परेचर जैसी करीब 32 अन्य जरूरी मेडिकल जांच भी की जाती हैं।
इन सभी प्रक्रियाओं के पूरा होने पर एक व्यक्ति के स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़े 60 से अधिक अलग-अलग आंकड़े एक साथ सामने आ जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक किसी भी बीमारी के शुरुआती लक्षणों को समय रहते पकड़ने में बेहद मददगार साबित होगी।
दुर्गम भौगोलिक चुनौतियों के बीच प्रशासनिक सहयोग
उत्तराखंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में बड़ी बाधा बनती हैं, खासकर जब मरीजों को विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंचने के लिए मीलों का सफर तय करना पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) उत्तराखंड और चंपावत के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय के संयुक्त मार्गदर्शन में इस पायलट प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारा गया है।
राज्य के मिशन निदेशक डॉ. संदीप तेवारी ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में कई बार लोगों को एक अच्छे विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंचने में पूरा दिन लग जाता है, ऐसे में एनएचएम का हमेशा से यह प्रयास रहा है कि आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं नागरिकों के और अधिक करीब लाई जाएं।
डॉक्टरों के फैसले को मिलेगी तकनीकी मजबूती
स्वास्थ्य विभाग और आयोजक कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह एआई सिस्टम किसी भी तरह से डॉक्टरों का विकल्प नहीं है, बल्कि यह केवल एक सहायक उपकरण के रूप में काम करेगा। इरोस वेलनेस अनुसंधान एवं विकास की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. शिल्पा देसाई ने इस बात पर जोर दिया कि कंपनी का उद्देश्य केवल सटीक स्वास्थ्य डेटा उपलब्ध कराना है, जबकि किसी भी बीमारी की सटीक पहचान और उसके इलाज से जुड़ा अंतिम फैसला हमेशा डॉक्टर ही लेंगे।
गुजरात और आंध्र प्रदेश के बाद उत्तराखंड की अलग जीवनशैली और भौगोलिक बनावट से मिलने वाले अनुभव इस तकनीक को देश के अन्य पर्वतीय राज्यों में और अधिक परिपक्व बनाने में मदद करेंगे।









