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उत्तराखंड एमबीबीएस फर्जीवाड़ा, 370 संदिग्ध छात्रों की सूची स्वास्थ्य मंत्री के पास पहुंची

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दून हॉराइज़न, देहरादून (18 सितंबर) : उत्तराखंड में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे से एमबीबीएस (MBBS) में प्रवेश पाने का विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस संवेदनशील प्रकरण में नया मोड़ तब आया जब मामले का खुलासा करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने सीधे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल को 370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की एक लंबी सूची सौंप दी।

इस नई फेहरिस्त के सामने आने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि यह दायरा अब शुरुआती चार मामलों से कहीं आगे निकल चुका है।

शुरुआती जांच के दायरे से बाहर आकर यह मामला अब एक बड़े संगठित फर्जीवाड़े की शक्ल लेता दिख रहा है। एक्टिविस्ट का दावा है कि सूची में शामिल कई ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट (NEET) की प्रक्रिया किसी अन्य राज्य से पूरी की, लेकिन इसके बावजूद उत्तराखंड के मूल निवासी और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित होने के फर्जी प्रमाण-पत्र हासिल कर लिए। राज्य के मेडिकल कॉलेजों में मिलने वाले इस विशेष आरक्षण का अनुचित लाभ उठाने के लिए तैयार किए गए इन दस्तावेजों की सत्यता पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

कार्रवाई और कानूनी शिकंजे की बात करें तो स्थानीय प्रशासन पहले ही इस दिशा में कुछ कदम उठा चुका है। जिला प्रशासन देहरादून की शुरुआती जांच के दौरान गंभीर विसंगतियां मिलने पर चार अभ्यर्थियों के आश्रित प्रमाण-पत्र निरस्त किए गए थे, जिसके बाद उनके दाखिले भी रद्द कर दिए गए थे।

इतना ही नहीं, इस फर्जीवाड़े में संलिप्तता के चलते चार छात्राओं सहित पांच लोगों के खिलाफ शहर के दो अलग-अलग थानों में मुकदमे भी दर्ज किए जा चुके हैं। पुलिस अब इस बात की तह तक जाने का प्रयास कर रही है कि आखिर ये कूटरचित दस्तावेज किस स्रोत से तैयार कराए गए थे और इस पूरे खेल में पर्दे के पीछे कौन लोग सक्रिय हैं।

पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने इस स्थिति को बेहद गंभीर करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहले के मामलों में जिलाधिकारी देहरादून को सख्त जांच के आदेश दिए गए थे, जो प्रक्रिया अभी भी गतिमान है।

साथ ही चिकित्सा शिक्षा महानिदेशालय को यह हिदायत दी गई है कि आगामी काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान यदि किसी भी स्तर पर दस्तावेजों में जरा भी संदेह पाया जाता है, तो बिना किसी देरी के त्वरित कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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