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उत्तराखंड में SIR प्रक्रिया पर कांग्रेस का बड़ा हमला, 13.89 लाख वोटर्स के नाम कटने का दावा

उत्तराखंड में एसआईआर प्रक्रिया और मतदाता सूची संशोधन को लेकर कांग्रेस ने उठाए गंभीर सवाल। 13.89 लाख वोटर्स के नाम कटने का दावा करते हुए चुनाव आयोग को घेरा।

देहरादून (05 अक्टूबर): उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष सारांश संशोधन (एसआईआर) और एसआईआर प्रक्रिया के अंतिम प्रकाशन के बाद सूबे की राजनीति में भूचाल आ गया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर और तीखे सवाल खड़े किए हैं।

पार्टी का साफ कहना है कि देश के अन्य राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी यह पूरी कवायद मतदाताओं को हताश करने, परेशान करने और पात्र लोगों के वोट सूची से बाहर करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र साबित हुई है। राजधानी देहरादून में आयोजित एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेताओं ने आंकड़ों की बाजीगरी और प्रशासनिक स्तर पर बरती गई कथित अनियमितताओं के कई दस्तावेज सार्वजनिक किए।

85 लाख से घटकर 7.25 लाख पर पहुंची वोटर्स की संख्या

कांग्रेस एसआईआर समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक मनोज रावत, प्रदेश सचिव अमरेन्द्र सिंह बिष्ट और समिति के सदस्य संदीप चमोली ने संयुक्त रूप से आंकड़े पेश करते हुए बताया कि जनवरी 2025 में उत्तराखंड में कुल मतदाताओं का आंकड़ा 85,19,271 पर था। इसके बाद प्री-एसआईआर और एसआईआर के विभिन्न चरणों के तहत अक्टूबर 2026 में अंतिम सूची आने तक सामान्य और सर्विस मतदाताओं को मिलाकर यह संख्या गिरकर करीब 7.25 लाख के आसपास पहुंच गई है।

पार्टी ने हैरानी जताई कि पिछले 10 से 12 सालों के दौरान यानी 2014 के लोकसभा चुनाव (68.83 लाख) और 2017 के विधानसभा चुनाव (75.92 लाख) के मुकाबले जनसंख्या लगातार बढ़ी है, लेकिन पिछले नौ महीनों में ही 13.89 लाख सामान्य मतदाताओं के नाम सूची से गायब हो जाना किसी बड़े झोल की ओर इशारा करता है।

फर्जी फॉर्म-7 और स्वतः सृजित आपत्तियों का बड़ा जाल

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं और बूथ लेवल एजेंटों (बीएलए) ने हजारों की संख्या में फर्जी फॉर्म-7 भरकर गरीब, अनुसूचित जाति, जनजाति और कम पढ़े-लिखे लोगों के नाम कटवाने की साजिश रची। राज्यभर में कुल 96,704 आपत्तिकर्ताओं ने फॉर्म-7 का इस्तेमाल किया, जिनमें से कागजी और कानूनी विरोध के बाद केवल 7,523 नाम ही कट पाए।

इसके अलावा, चुनाव आयोग के सिस्टम द्वारा तार्किक विसंगतियों के नाम पर 97,186 मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए। कांग्रेस का आरोप है कि जवाब न मिलने पर आयोग के सिस्टम ने खुद-ब-खुद फॉर्म-7 सृजित कर दिए, जिससे बिना किसी सुनवाई के हजारों पात्र मतदाताओं के नाम काट दिए गए।

हरिद्वार ग्रामीण के बूथ संख्या 65 (सराय) का हवाला देते हुए नेताओं ने बताया कि वहां दस्तावेज अपलोड होने के बावजूद 123 मतदाताओं के नाम काट दिए गए, जबकि वे मतदाता बूथ पर पूरी तरह वैध रूप से मौजूद थे। पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि इस मनमानी पर रोक नहीं लगी, तो वे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।

बीएलओ की मेहनत की सराहना और आगे की कानूनी लड़ाई

विवादों के इस दौर के बीच कांग्रेस ने मैदानी स्तर पर काम करने वाले बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) और खासकर आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों की कार्यकुशलता और निष्पक्षता की जमकर तारीफ की। पार्टी का कहना है कि अत्यधिक तकनीकी और जटिल कार्य के बावजूद मैदानी कर्मचारियों ने पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाई है, लेकिन दिल्ली से नियंत्रित होने वाली चुनाव आयोग की केंद्रीकृत प्रणाली के कारण स्थानीय अधिकारी चाहकर भी राहत नहीं दे पा रहे हैं।

कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि जो मतदाता प्रक्रिया की खामियों के कारण छूटे हैं, उन्हें फॉर्म-6 के जरिए दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया में कानूनी अड़चनें हैं, क्योंकि पहले से दर्ज वैध मतदाता को नया वोटर घोषित करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। पार्टी इस पूरे मामले को लेकर कानूनी विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रही है।

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