Bengaluru Living Challenges : कभी बेंगलुरु को लोग “सपनों का शहर” कहते थे, लेकिन अब यही शहर कई लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गया है. तकनीकी तरक्की की चमक तो है, लेकिन ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना यहाँ मुश्किल हो गया है. पहले यहाँ स्टार्टअप्स की बाढ़ थी, लेकिन अब कंपनियाँ बेंगलुरु (Bengaluru) से अपना बोरिया-बिस्तर समेट रही हैं.
ऑफिस चलाना मुश्किल, कंपनियाँ भाग रही हैं
बेंगलुरु (Bengaluru) में ट्रैफिक का आलम और सड़कों की खस्ता हालत ने अब कंपनियों को भी तंग कर दिया है. हाल ही में ऑनलाइन ट्रकिंग कंपनी ब्लैकबक ने बेलंदूर में अपना ऑफिस बंद कर दिया, जो पिछले 9 साल से चल रहा था.
कंपनी का कहना है कि ट्रैफिक की भयंकर मार और टूटी-फूटी सड़कों ने काम को नामुमकिन बना दिया. बेंगलुरु (Bengaluru living challenges) में अब ऑफिस चलाना किसी जंग से कम नहीं.
काम का बोझ, ना सुकून, ना समय
शहर में रहने वाले कर्मचारी भी हालात से परेशान हैं. हाल ही में एक युवक ने सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती शेयर की. उसने बताया कि उसने कॉरपोरेट नौकरी छोड़ दी, क्योंकि शरीर और दिमाग दोनों जवाब दे रहे थे. उसने लिखा, “यहाँ वर्क-लाइफ बैलेंस बस नाम का है. सुबह निकलो, रात को लौटो, और फिर वही काम का चक्कर.
ना परिवार को वक्त, ना खुद को.” ट्रैफिक में रोज़ घंटों फँसना, खराब सड़कें और महंगाई ने बेंगलुरु (Bengaluru) में ज़िंदगी को मुश्किल बना दिया है. लोग लाखों कमा रहे हैं, लेकिन बचत कुछ नहीं.
घर लेना: अब सपना बन गया
बेंगलुरु (Bengaluru living challenges) में महंगाई ने कमर तोड़ दी है. यहाँ एक ठीक-ठाक 2BHK फ्लैट का किराया पनथुर जैसे इलाके में ₹70,000 महीना और सिक्योरिटी डिपॉजिट ₹5 लाख तक पहुँच गया है. प्रीमियम लिविंग के नाम पर ऐसे कई फ्लैट बिक रहे हैं. टैक्सी का किराया भी बेंगलुरु में दूसरे बड़े शहरों से कहीं ज़्यादा है. आम आदमी के लिए अब घर लेना सपने जैसा है.
सैलरी मोटी, लेकिन चैन गायब
बेंगलुरु (Bengaluru) के टेक कर्मचारियों की सैलरी सुनकर आँखें चमक उठती हैं. इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहाँ कई लोग 20 लाख सालाना से ज़्यादा कमा रहे हैं, कुछ तो करोड़ों तक. लेकिन सच ये है कि खर्च इतने हैं कि महीने के अंत तक जेब खाली हो जाती है. EMI, किराया, बच्चों की पढ़ाई, हेल्थ इंश्योरेंस—सब मिलाकर सैलरी हवा हो जाती है. एक इंजीनियर ने ऑनलाइन लिखा, “हम टेक्नोलॉजी की रीढ़ हैं, लेकिन खुद को संभाल नहीं पा रहे. पैसा आता है, लेकिन सुकून कहीं नहीं.”
नौकरी का डर, सेहत की टेंशन
अब नौकरी की कोई गारंटी नहीं. टेक्नोलॉजी तेज़ी से बदल रही है, और कंपनियाँ उसी रफ्तार से कर्मचारियों को निकाल रही हैं. लोग हर दिन इस डर में जीते हैं कि कब नौकरी चली जाए. ऊपर से तनाव, नींद की कमी और बीमारियाँ आम हो गई हैं. कुछ कंपनियाँ जैसे Deloitte और P&G ने फाइनेंशियल प्लानिंग की सलाह देना शुरू किया है, लेकिन ज़िंदगी का तनाव एक सेमिनार से दूर नहीं होता.
शहर को सुधार की सख्त ज़रूरत
बेंगलुरु (Bengaluru living challenges) के हालात ऐसे हैं कि लोग सोच रहे हैं, क्या यहाँ रहना अब सही है? सपनों का शहर अब लोगों को थका रहा है. महंगाई, ट्रैफिक, काम का दबाव और नौकरी की असुरक्षा ने सबकी ज़िंदगी उलझा दी है.
जानकारों का कहना है कि अगर सरकार और प्रशासन ने जल्द कदम नहीं उठाए, तो बेंगलुरु अपनी सबसे बड़ी ताकत—लोगों और कंपनियों—को खो देगा. यहाँ काम करने वाले अभिषेक का कहना है, “शहर को फिर से जीने लायक बनाना होगा, वरना लोग इसे छोड़कर किसी और शहर में राहत तलाशने निकल पड़ेंगे.”









