पितृसत्ता के बोझ तले दबी स्त्री, खुशबू बोरा की कलम से

खुशबू बोरा : भारतीय समाज एक पुरुष प्रधान समाज रहा है, जहां पुरूषों को महिलाओं की तुलना में ज्यादा अधिकार दिए गए हैं. पितृसत्तात्मक समाज के अंतर्गत भारतीय समाज में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से श्रेष्ठता दी गई है. इसमें हमेशा से पुरुषों का वर्चस्व रहा है.

हालांकि समय समय पर महिलाओं ने अपनी हुनर, काबलियत और मेहनत से यह साबित किया है कि वह किसी भी रूप में पुरुषों से कम नहीं है और समाज को उसे भी बराबरी का अवसर और सोच प्रदान करनी चाहिए. ज़मीन से लेकर अंतरिक्ष तक महिलाओं ने सुनहरे अक्षरों में अपनी सफलता की गाथा लिख दी है.

लेकिन इसके बावजूद 21वीं सदी के इस दौर में भी उसे अपने मौलिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष करनी पड़ रही है.

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि पुरुष और महिला के मध्य जो असमानताएं देखने को मिलती हैं, क्या प्रकृति ने उसे खुद बनाया है या इस पितृसत्तात्मक समाज के खोखले कानून हैं? दरअसल महिलाओं को कमज़ोर साबित करने और कमतर आंकने का रूढ़िवादी नजरिया पुरुष प्रधान समाज ने तैयार किया है. इस परंपरा ने स्त्रियों को विवशता की बेड़ियों में जकड़ कर रखा है. ऐसी व्यवस्था जहां पुरुष घर का मुखिया माना जाता है और उसका निर्णय ही प्रभावी होता है चाहे उसका निर्णय एक स्त्री की अस्मिता और उसके अधिकारों को ही क्यों न रौंदता हो.

पितृसत्तात्मक समाज में किसी स्त्री का पुरुषों द्वारा लिए गए निर्णयों के विरोध का कोई स्थान नहीं होता है. यदि किसी ने हिम्मत भी दिखाई तो उसके हिस्से में केवल चारित्रिक लांछन और बहिष्कार ही आता है. समाज में लड़की या स्त्री से अधिक लड़के या पुरुष को महत्व दिया जाता है और वही शक्ति का केंद्र होता है.

चाहे घर पर सबसे बड़ी और उम्रदराज़ महिला ही क्यों न हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से अंतिम निर्णय उससे छोटे पुरुष का ही माना जाता है. आज भी बेटे के पैदा होने पर सोहरगाना, केवल लड़का होने पर पूजा करना आदि पितृसत्तात्मक समाज में मौजूद लड़के-लड़की के बीच मौजूद अंतर को दिखाता है. 

पितृसत्तात्मक समाज की यह अवधारणा शहरों की अपेक्षा ग्रामीण भारत में अधिक दिखाई देती है. पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में भी पितृसत्तात्मक समाज गहराई से अपनी जड़ें जमाये हुए है. राज्य के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक का पिंगलो गांव इसका उदाहरण है. जहां महिलाओं के खिलाफ कई प्रकार के भेदभाव और कुप्रथाएं आज भी हावी हैं. जहां पुरुषों को ही हमेशा स्त्री से उच्च दर्जा दिया जाता है.

वैज्ञानिक रूप से तो देश आगे बढ़ रहा है, लेकिन सामाजिक और वैचारिक रूप से आज भी पिछड़ा हुआ है. जहां समाज में कई प्रकार से स्त्री और पुरुष में भेदभाव किया जाता है. सदियों से चले आ रहे रीति-रिवाज आज भी ज्यों-के-त्यों विधमान हैं. गांव भले ही इंटरनेट के माध्यम से देश और दुनिया से जुड़ कर विकास की राह पर चल पड़ा हो, लेकिन स्त्रियों को कमतर समझने वाले आज भी वही पुराने रीति रिवाज विधमान हैं. 

गांव का समाज अभी तक इन सब बातों को मानता है. जैसे गांव में अक्सर पुरुष ही काम करने के लिए बाहर जाता है और स्त्री घर का काम करती है. इसके बावजूद घर के निर्णय लेने का अधिकार पुरुष का ही होता है. उस निर्णय में कभी भी स्त्री की राय नहीं ली जाती है. इस संबंध में गांव की एक किशोरी दीक्षा का कहना है कि हमारे घर के फैसले मेरे दादाजी और पिताजी लेते हैं, यदि वह घर पर नहीं होते हैं तो मेरा भाई फैसला लेता है.

जिसे हम सब को मानना होता है. परंतु यह सही नहीं है. उनका फैसला हमेशा सही नहीं हो सकता है. कभी महिलाओं से भी पूछना चाहिए कि वह क्या चाहती है? उसकी राय को भी महत्त्व दिया जाना चाहिए. नए युग और आधुनिक समाज में जन्मी दीक्षा का यह विचार सही है, लेकिन पुरुष आधिपत्य वाले समाज में यह मुमकिन नहीं है. 

वहीं गांव की एक महिला कविता देवी का कहना है कि हमारे घर के सभी फैसले पुरुष लेते हैं. महिलाओं को कभी यह अधिकार दिया ही नहीं गया. अगर हम कभी कुछ बोलते भी हैं, तो वह कहते हैं कि यह पुरुषों का काम है. महिलाओं को चूल्हा संभालना चाहिए, घूंघट में रहना और पुरुषों के निर्णयों को स्वीकारना ही उनका धर्म है.

इसी विषय पर गांव की एक बुज़ुर्ग नरुली देवी का कहना है कि मैने हमेशा से देखा है कि घर के फैसले पुरुष ही लेते आए हैं, अगर बड़े पुरुष घर पर न हो तो घर का बेटा फैसले लेता है, लेकिन हमसे कभी नहीं पूछा जाता है. हालांकि वह इसे गलत मानती हैं, लेकिन अगले ही पल इसे परंपरा का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लेती हैं.

आज़ादी के बाद से ही समाज में महिलाओं को बराबरी का हक़ दिलाने के उद्देश्य से समय समय पर केंद्र और राज्य सरकारों ने कई कदम उठाये हैं. इसमें सबसे अहम पंचायतों में 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना है. इससे महिलाओं की भागीदारी तो बढ़ी है, लेकिन क्या वास्तव में इससे महिलाओं को निर्णय लेने का अधिकार मिल गया है? आज भी यह प्रश्न अपनी जगह बरकरार है. इस संबंध में गांव की सरपंच उषा देवी का कहना है कि “आधिकारिक रूप से कागज़ों में मैं सरपंच तो ज़रूर हूं, लेकिन गांव की किसी भी मीटिंग में अंतिम फैसला पुरुषों का ही होता है.

मैं तो सिर्फ नाम की और उन फैसलों पर अंतिम मुहर लगाने की सरपंच हूं. चाहे वह फैसला महिलाओं के लिए ही क्यों न हो, उस पर महिला होने के बावजूद मेरे निर्णय का कोई महत्व नहीं होता है. इस संबंध में महिला सामाजिक कार्यकर्ता नीलम ग्रैन्डी का कहना है कि आज भी हमारा समाज पितृसत्ता से पीड़ित है. किसी भी निर्णय के अंतिम में मुहर पुरषों का ही होता है. न केवल बाहर, बल्कि घर के अंदर भी पुरुषों का ही अधिकार होता है. यह फैसला भी उन्हीं के हाथ में रहता है कि महिलाएं घर से बाहर जाकर काम करेगी या नहीं?

वास्तव में पितृसत्ता, एक ऐसा शब्द है, जिसके निहितार्थ को समझना आज के दौर में युवतियों के लिए बहुत जरूरी है. दरअसल यह बहेलिए के उस जाल की तरह है, जिसमें चिड़िया फंस जाती है और फिर कभी बाहर नहीं निकल पाती है. मगर पितृसत्ता का जाल उससे भी भयानक है. कभी परिवार की मर्यादा के नाम पर, कभी समाज का भय दिखा कर, तो कभी पुरुषों से कमजोर बता कर महिलाओं को पिता, भाई, पति और अंत में बेटे के अधीन बनाकर उसके सपनों को कुचल दिया जाता है.

ऐसे में इस मानसिकता को समाप्त करना जरूरी है. महिलाओं के अपने सपने, अपनी सोच और अपनी आजादी को इसी जाल में उलझा कर ख़त्म कर दिया जाता है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने लोगो की मानसिकता को इस प्रकार जकड़ लिया है कि उन्हें लगता ही नहीं है कि कुछ गलत हो रहा है. तमाम तरह के उत्पीड़नों को कुदरती या प्राकृतिक कहकर जायज ठहरा दिया जाता है. प्रकृति का फैसला बताकर उसे कभी न बदलने वाला नियम बना दिया जाता है. 

स्त्री को स्‍वतंत्र इंसान न समझ कर उसे पुरुष का गुलाम माना जाता है. यही कारण है कि उसे पुरुषों जैसा सम्मान नहीं दिया जाता है. यह परंपरा और सोच पीढ़ी-दर-पीढ़ी शान से हस्तांतरित की जाती रही है. जबकि मान-अपमान का प्रश्न समाज में सभी के लिए समान महत्व रखता है. इसके बावजूद एक स्त्री जब समाज में अपमानित महसूस करती है तो उसके अपमान को सामान्‍य व्‍यवहार बताकर बार-बार दोहराया जाता है. यदि कोई स्त्री इस तरह के व्यवहार का विरोध करे भी तो इससे परिवार टूट जाएगा, समाज की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी, कह कर चुप करा दिया जाता है.

यही सोचकर महिलाओं को इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत केवल सहन करना सिखाया जाता है. सवाल यह उठता है कि क्या कभी इस समाज में स्त्री को पुरुष के समान अधिकार मिलेंगे? क्या उसे कभी स्वयं घर का निर्णय लेने का भी अधिकार मिल पाएगा? या पितृसत्ता के बोझ तले वह ऐसे ही दबी रहेगी?

खुशबू बोरा – पिंगलो, गरुड़, बागेश्वर (उत्तराखंड)

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