राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भाजपा की शुरू तैयारी, नीतीश के ट्रैक रिकॉर्ड से भाजपा चिंतित

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भाजपा ने तैयारी शुरू कर दी है। सबसे पहले पार्टी की ओर से जिन नेताओं से संपर्क किया गया है उनमें पहला नाम नीतीश कुमार का है। सवाल है कि नीतीश कुमार भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री हैं फिर भाजपा को उनकी चिंता क्यों करनी चाहिए? ध्यान रहे नीतीश कुमार के पास महज 45 विधायक हैं, जबकि भाजपा 78 विधायकों के साथ बिहार विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी है इसके बावजूद उसने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया है। इसलिए कायदे से उसे नीतीश कुमार की चिंता नहीं करनी चाहिए। लेकिन भाजपा को सबसे ज्यादा चिंता उन्हीं की है।

तभी केंद्रीय शिक्षा मंत्री और बिहार के पूर्व प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान को पटना भेजा गया। बिहार प्रदेश भाजपा के नेता इस मामले से दूर रहे। प्रधान ने कोई दो घंटे नीतीश कुमार के साथ बिताए। बताया जा रहा है कि उन्होंने राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव के बारे में नीतीश से बात की। इस बात भी चर्चा है कि दोनों के बीच नीतीश की भूमिका को लेकर भी बातचीत हुई। ध्यान रहे पिछले कुछ दिन से यह चर्चा है कि नीतीश बिहार छोड़ कर केंद्रीय भूमिका में जा सकते हैं। उनके एक, अणे मार्ग खाली कर सात, सरकुलर रोड जाने से भी इस चर्चा को बल मिला है।

बहरहाल, भाजपा की चिंता का कारण नीतीश कुमार का ट्रैक रिकॉर्ड है। उन्होंने राष्ट्रपति के पिछले दो चुनावों में गठबंधन से अलग हट कर वोट किया। 2012 में राष्ट्रपति चुनाव के समय नीतीश कुमार एनडीए का हिस्सा थे लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था। इसी तरह 2017 के राष्ट्रपति चुनाव के समय वे राजद और कांग्रेस के महागठबंध का हिस्सा थे, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन किया था, जबकि कांग्रेस ने बिहार की दलित नेता मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाया था। इसी ट्रैक रिकॉर्ड को लेकर भाजपा चिंतित है।

ध्यान रहे नीतीश कुमार ने जब दूसरी बार यानी 2017 में जब महागठबंधन की बजाय एनडीए का समर्थन किया था तभी वे एनडीए में वापस भी लौटे थे। जुलाई 2017 में ही राष्ट्रपति का चुनाव हुआ, जिसमें उन्होंने कोविंद का समर्थन किया और जुलाई के आखिर में वे एनडीए में लौट गए। इस बार भी कहीं ऐसी कहानी न दोहराई जाए इसलिए भाजपा पहले से घेराबंदी कर रही है। नीतीश को पता है कि उनके पास भले 45 विधायक हैं लेकिन उनके बगैर किसी की सरकार नहीं बनेगी।

वे जिधर जाएंगे उधर की सरकार बनेगी। सो, भाजपा को चिंता है कि कहीं 2017 की तरह उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के साथ गठबंधन बदल कर लिया तो राज्य में राजद, कांग्रेस गठबंधन की सरकार बन सकती है और अगला लोकसभा चुनाव मुश्किल हो सकता है। तभी भाजपा की भागदौड़ राष्ट्रपति चुनाव के लिए नहीं है, बल्कि बिहार की सरकार और आगे की चुनावी संभावना के लिए है।

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