उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हेमवती नंदन बहुगुणा बेस अस्पताल, श्रीनगर के संविदा फार्मासिस्टों की नई याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पहले ही सरकार को नियमितीकरण पर फैसला लेने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है, तो दोबारा याचिका दायर करना सही नहीं है. तब तक कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा बरकरार रहेगी.
Uttarakhand High Court : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हेमवती नंदन बहुगुणा (HNB) बेस अस्पताल, श्रीनगर में पिछले 14 वर्षों से संविदा पर तैनात फार्मासिस्टों की नई याचिका को खारिज कर दिया है.
न्यायमूर्ति आलोक महरा की अवकाश कालीन एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि जब कोर्ट पहले ही कर्मचारियों के हक में दिशा-निर्देश जारी कर चुका है, तो एक ही मांग को लेकर दोबारा अदालत आना न्यायसंगत नहीं है.
पहले से मिली हुई है सुरक्षा
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 12 दिसंबर 2025 को दिए गए आदेश में सरकार को नियमितीकरण पर विचार करने के लिए एक समिति गठित करने को कहा गया था. इसके लिए सरकार को 6 महीने का समय दिया गया है, जो अभी पूरा नहीं हुआ है.
अदालत ने यह भी याद दिलाया कि पुराने आदेश के मुताबिक, जब तक सरकार अंतिम फैसला नहीं ले लेती, तब तक याचियों की सेवा में कोई व्यवधान नहीं डाला जाएगा. ऐसे में कर्मचारियों की नौकरी फिलहाल सुरक्षित है और उन्हें नई याचिका की जरूरत नहीं है.
नियमितीकरण के नए नियम और सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान नियमितीकरण नियमावली में हुए बदलाव का मुद्दा भी सामने आया. सरकार ने 5 दिसंबर 2025 को नियमों में संशोधन किया है. इसके तहत, 4 दिसंबर 2018 तक 10 साल की निरंतर सेवा पूरी करने वाले संविदा कर्मचारी ही नियमितीकरण के पात्र माने जाएंगे.
याचिकाकर्ता उपेंद्र बंगवाल और अन्य का तर्क था कि वे 2011 से काम कर रहे हैं, इसलिए उनका दावा मजबूत है. इस पर सरकारी वकीलों ने बताया कि 19 अक्टूबर 2024 के विज्ञापन के आधार पर भर्ती प्रक्रिया चल रही है और 17 जनवरी 2026 को परिणाम भी आ चुका है. विभाग फिलहाल कोर्ट के आदेशानुसार कर्मचारियों के दावों की समीक्षा कर रहा है.
‘रेजुडिकाटा’ के आधार पर फैसला
अदालत ने इस मामले में ‘रेजुडिकाटा’ (Res Judicata) का सिद्धांत लागू किया. इसका अर्थ है कि जिस विषय पर कोर्ट पहले ही फैसला या निर्देश दे चुका है, उस पर दोबारा मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
न्यायमूर्ति महरा ने माना कि पिछली याचिका और वर्तमान याचिका की मांगें लगभग एक जैसी हैं. चूंकि कर्मचारियों को पहले ही 6 महीने की सुरक्षा और नियमितीकरण पर विचार का आदेश मिल चुका है, इसलिए कोर्ट ने इस नई याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया.









