देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी में मॉनसून की चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं के असर को कम करने के लिए जिला प्रशासन ने कमर कस ली है। जिलाधिकारी सविन बंसल ने शुक्रवार को ऋषिपर्णा सभागार में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की अहम बैठक ली। इस दौरान उन्होंने साफ किया कि जन सुरक्षा से जुड़े कार्यों में कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
बैठक में आपदा प्रबंधन अधिनियम-2005 की धाराओं का हवाला देते हुए उन सभी सुरक्षात्मक कार्यों को मंजूरी दी गई, जो लंबे समय से लंबित थे। जिलाधिकारी ने निर्देश दिए कि नदियों के चैनलाइजेशन और ड्रेजिंग का काम युद्ध स्तर पर पूरा किया जाए। उनका मुख्य फोकस उन इलाकों पर है जहां हर साल नदी का जलस्तर बढ़ने से आबादी को खतरा पैदा होता है।
प्रशासन ने इस बार 28 ऐसे जोखिम भरे स्थानों की पहचान की है जहां नदी तटों पर सुरक्षा दीवार या चैनलाइजेशन की सख्त जरूरत है। अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) केके मिश्रा ने बताया कि मार्च के महीने में ही इन कार्यों को स्वीकृति देने का मकसद विभागों को काम पूरा करने के लिए पर्याप्त समय देना है। आरक्षित वन क्षेत्रों में होने वाले भूस्खलन के उपचार को भी प्राथमिकता सूची में रखा गया है।
हरिपुर कालसी क्षेत्र में यमुना नदी के तट पर आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। यहां नदी के चैनलाइजेशन के साथ-साथ नए घाटों का निर्माण किया जाएगा। इसके अलावा, कालसी-चकराता मोटर मार्ग पर ‘जजरेड’ नामक स्थान, जो कि एक पुराना लैंडस्लाइड जोन (Chronic Slide Zone) है, वहां आधुनिक तकनीक से भूस्खलन रोकने के स्ट्रक्चर बनाए जाएंगे।
राष्ट्रीय राजमार्ग-507 पर भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम होंगे। किमी 13-14 के बीच यमुना नदी पर बने पुल के एबटमेंट को बचाने के लिए कर्टेन वॉल और स्कप्पर निर्माण को मंजूरी मिली है। व्यासी और बोसाना जैसे इलाकों में भी पहाड़ी दरकने की समस्या का स्थायी समाधान ढूंढने के निर्देश दिए गए हैं।
भानियावाला-ऋषिकेश मार्ग पर बहने वाली चंद्रभागा नदी और जाखन ब्रिज के पास जमा मलबे को हटाने के लिए एक संयुक्त जांच समिति बनाई गई है। इसमें उपजिलाधिकारी, वन विभाग और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी शामिल होंगे। यह टीम मौके का मुआयना कर रिपोर्ट देगी, जिसके बाद भारी मशीनों के जरिए नदी की सफाई और मलबे का निस्तारण शुरू होगा।









