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पीएफ कर्मचारियों पर टूटा दुखों पहाड़, उम्मीदों को लगा यह बड़ा झटका

केंद्र सरकार इन दिनों पीएफ कर्मचारियों के लिए खजाने का पिटारा खोले हुए है, जिसे लेकर लोगों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है।
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पीएफ कर्मचारियों पर टूटा दुखों पहाड़, उम्मीदों को लगा यह बड़ा झटका

केंद्र सरकार इन दिनों पीएफ कर्मचारियों के लिए खजाने का पिटारा खोले हुए है, जिसे लेकर लोगों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है। इससे पीएफ कर्मचारियों के चेहरे पर काफी मुस्कुराहट झलक रही है।

माना जा रहा है कि सरकार पीएफ कर्मचारियों के खाते में 30 अगस्तक तक ब्याज का पैसा ट्रांसफर कर देगी, जिससे बड़ा लाभ होगा। दूसरी ओर पीएफ कर्मचारियों को अब एक करारा झटका लगा है, जिससे करोड़ों लोगों के चेहरे पर मायूसी छाई है।

पीएफ फंड पर ज्यादा ब्याज की उम्मीदों को तगड़ा झटका लग गया है। जानकारी के लिए बता दें कि रिटायरमेंट फंड का प्रबंधन करने वाले निकाय ईपीएफओ ने शेयरों में निवेश की सीमा को 15 फीसदी से बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने के प्रस्ताव पर अभी कोई चर्चा नहीं की गई है। ईपीएफओ के न्यासी हरभजन सिंह ने यह जानकारी साझा की है।

वहीं, हरभजन के मुताबिक, शेयर या शेयर संबंधित योजनाओं में निवेश बढ़ाने का प्रस्ताव 29 और 30 जुलाई को हुई केंद्रीय न्यासी बोर्ड की 231वीं बैठक में विचार के लिए नहीं रखा गया। उन्होंने कहा कि ईपीएफओ कार्यकारिणी की इस सप्ताह की शुरुआत में हुई बैठक में कर्मचारियों के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था।

उनका कहना था कि ईपीएफओ के निवेश प्रारूप में संशोधन के पहले शेयर बाजारों की अस्थिर प्रकृति को देखते हुए इस पर अधिक विस्तृत विचार-विमर्श करने की जरूरत है।

बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का था प्रस्ताव

वहीं, इस सुझाव को देखते हुए न्यासी बोर्ड की बैठक के संशोधित एजेंडे के तहत शेयरों या संबंधित योजनाओं में निवेश बढ़ाने के प्रस्ताव को वापस ले लिया गया। शेयर से संबंधित योजनाओं में निवेश-योग्य निधियों के आवंटन को मौजूदा 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का प्रस्ताव था।

आपको बता दें कि फिलहाल ईपीएफओ निवेश-योग्य जमा का पांच प्रतिशत से लेकर 15 प्रतिशत तक शेयर या शेयर संबंधित योजनाओं में निवेश कर सकता है। ईपीएफओ को सलाह देने वाली वित्त लेखा एवं निवेश समिति (एफएआईसी) ने इस सीमा को संशोधित कर 20 प्रतिशत तक करने के प्रस्ताव का समर्थन किया है।

इस सिफारिश पर ईपीएफओ की शीर्ष निर्णायक इकाई सीबीटी को विचार करना था लेकिन विरोध की वजह से ऐसा नहीं किया जा सका।