Chhath Puja Prasad : लोक आस्था और विश्वास का पर्व छठ पूजा हर साल बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से सूर्य उपासना और परिवार की खुशहाली के लिए होता है।
छठ पूजा दो दिन तक चलती है – पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा दिन खरना और उसके बाद संध्या अर्घ्य व उषा अर्घ्य। खरना का दिन छठ व्रती के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
इस दिन व्रती निर्जला व्रत रखने से पहले छठी मैया का प्रसाद ग्रहण करती हैं। तो सवाल उठता है – खरना में प्रसाद कब और कैसे बनता है? आइए विस्तार से जानते हैं।
खरना में छठ मैया का प्रसाद कब बनता है?
परंपरा के अनुसार, खरना का प्रसाद शाम के समय बनता है। इस दिन व्रती नहाय-खाय के बाद शाम को गुड़ और चावल से बनी खीर और गेहूं की रोटी बनाकर उसका भोग लगाती हैं।
प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी का नया चूल्हा तैयार किया जाता है। इसके ऊपर आम की लकड़ी से आग लगाई जाती है।
इसके बाद गुड़ और चावल की खीर बनाई जाती है। साथ ही गेहूं के आटे की रोटी या पूड़ी भी तैयार की जाती है।
शाम को सूर्य देव की पूजा और आराधना के बाद व्रती इस प्रसाद का सेवन करती हैं। यही प्रसाद व्रती को निर्जला व्रत की तैयारी में शक्ति प्रदान करता है।
खरना में प्रसाद बनाने की विधि
चूल्हा बनाना: मिट्टी का नया चूल्हा तैयार किया जाता है।
आग जलाना: आम की लकड़ी या सूखी लकड़ी से हल्की आग जलाई जाती है।
खीर तैयार करना: खीर बनाने के लिए गुड़ और चावल का मिश्रण धीमी आंच पर पकाया जाता है।
रोटी बनाना: गेहूं के आटे से रोटियां या पूड़ियां बनाई जाती हैं।
भोग अर्पित करना: प्रसाद को छठी मैया को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।
खरना पूजा और प्रसाद ग्रहण करने के नियम
घर में तेज आवाज और शोर-शराबा नहीं होना चाहिए। प्रसाद ग्रहण करते समय सदस्यों को शांत रहना चाहिए।
धार्मिक मान्यता है कि शोर-शराबा से व्रत की पुण्यता प्रभावित होती है।
खरना का प्रसाद व्रती की भक्ति और आस्था का प्रतीक है। यह न केवल व्रती को शक्ति देता है बल्कि परिवार और संतान के लिए मंगलकामना का संदेश भी देता है।
सावधानीपूर्वक बनाई गई खीर और रोटी का सेवन करना इस व्रत की परंपरा का अहम हिस्सा है।









