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Dehradun Exclusive : सख्त तेवर या तानाशाही? DM सविन बंसल और वकीलों के बीच छिड़ी जंग की इनसाइड स्टोरी।

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देहरादून, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में शासन और न्याय के दो स्तंभों के बीच टकराव अब निर्णायक मोड़ पर आ गया है, जहां जिलाधिकारी सविन बंसल और बार एसोसिएशन आमने-सामने हैं।

जिलाधिकारी सविन बंसल की कार्यशैली को लेकर अधिवक्ताओं में उपजा आक्रोश अब सड़कों पर उतर आया है। 4 अप्रैल को विधि भवन में आयोजित देहरादून बार एसोसिएशन की आम सभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर आर-पार की जंग छेड़ दी गई है। वकीलों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सविन बंसल का देहरादून से तबादला नहीं हो जाता, उनका विरोध जारी रहेगा।

विवाद की चिंगारी वरिष्ठ अधिवक्ता प्रेमचंद शर्मा के खिलाफ की गई कार्रवाई से भड़की है। डीएम सविन बंसल ने शर्मा का लाइसेंस निरस्त करने की संस्तुति की थी, जिसे वकील समुदाय अपने सम्मान पर सीधी चोट मान रहा है। अधिवक्ताओं का आरोप है कि एक सम्मानित वरिष्ठ सदस्य के खिलाफ ऐसा कदम उठाना पूरे समुदाय का अपमान है।

विरोध के पहले चरण में वकीलों ने राजस्व न्यायालयों (Revenue Courts) के कामकाज के पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया है। अब डीएम, एडीएम और एसडीएम अदालतों में कोई भी वकील पैरवी के लिए पेश नहीं होगा। इस गतिरोध के कारण जमीन-जायदाद, प्रमाण पत्र और अन्य राजस्व मामलों की सुनवाई पूरी तरह ठप होने की आशंका है, जिससे आम जनता की मुश्किलें बढ़ना तय है।

हालांकि, इस विवाद का दूसरा पहलू जिलाधिकारी के पक्ष में खड़ा नजर आता है। सविन बंसल अपनी ‘सख्त और बेदाग’ छवि के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने पद संभालते ही स्कूलों की औचक जांच, सरकारी गाड़ियों की जब्ती और राशन गोदामों पर छापेमारी जैसे कड़े फैसले लिए हैं। हाल ही में क्लेमेंट टाउन कैंट बोर्ड की महिला CEO अंकिता सिंह के साथ भी उनका विवाद चर्चा में रहा था, जिसकी शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंची थी।

जनता के बीच चर्चा है कि यह विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक कम और प्रायोजित ज्यादा लग रहा है। जिलाधिकारी ने जिस तरह से भू-माफियाओं और सिस्टम में बैठे बिचौलियों की भूमिका खत्म की है, उससे कई रसूखदारों के निजी हित प्रभावित हुए हैं। आम नागरिकों का मानना है कि सविन बंसल को काम करने से रोकने के लिए दबाव की राजनीति का सहारा लिया जा रहा है ताकि उनके द्वारा शुरू की गई भ्रष्टाचार की जांचें रुक सकें।

फिलहाल, गेंद मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के पाले में है। एक तरफ वकील अपनी जिद पर अड़े हैं, तो दूसरी तरफ जिलाधिकारी को मिल रहा जनसमर्थन शासन के लिए धर्मसंकट की स्थिति पैदा कर रहा है। प्रशासनिक हलकों में यह सवाल तैर रहा है कि क्या एक ईमानदार छवि वाले अफसर को रसूखदारों के दबाव में हटाया जाएगा या प्रशासन अपनी साख बचाए रखने के लिए सख्त रुख अपनाएगा।

विशेष नोट (Disclaimer):

“उपरोक्त लेख में व्यक्त किए गए विचार पूर्णतः लेखक (हरप्रीत सिंह) के व्यक्तिगत विचार और उपलब्ध सामाजिक फीडबैक पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या उनकी मानहानि करना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक चर्चा में मौजूद एक अन्य पक्ष को सामने रखना है।”

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