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Dev Diwali Muhurat : इस साल कब और कैसे मनाएं देव दिवाली, जानें पूरा मुहूर्त

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Dev Diwali Muhurat : देव दिवाली, जिसे देव दीपावली, त्रिपुरोत्सव या त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा को अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।

यह वही दिन है जब गंगा के घाटों पर दीपों का सागर उमड़ पड़ता है और पूरा वाराणसी शहर रोशनी से नहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा को साल की सबसे पवित्र पूर्णिमा कहा गया है।

इस दिन स्नान, दीपदान और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया हर पुण्य कर्म कई गुना फल देता है।

कब मनाई जाएगी देव दिवाली 2025?

इस वर्ष देव दिवाली 5 नवंबर 2025, बुधवार के दिन मनाई जाएगी।

  • सूर्योदय: सुबह 6:30 बजे के आसपास
  • पूर्णिमा तिथि: शाम 7:16 बजे तक
  • नक्षत्र: अश्विनी नक्षत्र सुबह 10:19 बजे तक, उसके बाद भरणी नक्षत्र प्रारंभ होगा
  • योग: सिद्धि योग दोपहर 1:00 बजे तक रहेगा

इस बार चंद्रमा मेष राशि में स्थित रहेगा, जिससे यह दिन और भी शुभ व ऊर्जावान माना जा रहा है।

क्यों मनाई जाती है देव दिवाली?

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने दुष्ट राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया, तब देवताओं ने अपनी विजय का उत्सव मनाने के लिए काशी में दीप जलाए।

उसी दिन से यह परंपरा प्रारंभ हुई और हर साल यह पर्व देवताओं की दीपावली के रूप में मनाया जाने लगा। कहा जाता है कि इस दिन देवता स्वयं धरती पर उतरते हैं और गंगा में स्नान करते हैं।

श्रद्धालु भी सुबह-सवेरे पवित्र नदियों में स्नान कर अपने मन, वाणी और कर्म से जुड़ी नकारात्मकता को दूर करते हैं।

शाम होते ही गंगा घाटों पर लाखों दीपक जलाए जाते हैं, जिनकी झिलमिल रोशनी गंगा के जल में झिलमिलाती है — मानो धरती पर सितारे उतर आए हों।

इस वर्ष के खास योग और महत्व

इस साल देव दिवाली के दिन सिद्धि योग और मेष राशि में उच्चाभिलाषी चंद्रमा का संयोग बन रहा है। यह संयोजन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ और फलदायक माना जाता है।
इस दिन का हर क्षण भक्ति, दान और ध्यान के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

आज के समय में यह उत्सव केवल धार्मिक नहीं रहा, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन का भव्य पर्व बन गया है। देश-विदेश से लोग वाराणसी आते हैं ताकि घाटों पर दीपों का महासागर देख सकें।

घाटों पर दिव्यता का अनुभव

देव दिवाली की शाम वाराणसी के दशाश्वमेध, अस्सी, पंचगंगा और राजघाट जैसे घाटों पर लाखों दीपक जलाए जाते हैं।

आरती की मधुर ध्वनि, भक्ति संगीत, और जल में झिलमिलाते दीप — ये सब मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं जो जीवनभर याद रहता है।

कई लोग इस दिन घरों में भी दीप जलाते हैं, भगवान शिव, माता गंगा और अपने कुलदेवताओं की पूजा करते हैं।

इस पर्व का उद्देश्य केवल दीप जलाना नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश की जीत और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का संदेश देना है

अगर आप बनना चाहते हैं इस पर्व का हिस्सा

घाटों पर आरती देखने के लिए समय से पहले पहुंचें, क्योंकि शाम को भीड़ बहुत अधिक होती है। दान-पुण्य करें, जैसे दीपदान, अन्नदान या वस्त्रदान — यह दिन दान के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

अगर आप बाहर से यात्रा कर रहे हैं, तो स्थानीय प्रशासन और मौसम की जानकारी पहले से लें। दीप जलाते समय सुरक्षा का ध्यान रखें, ताकि कोई दुर्घटना न हो।

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