लेह/देहरादून, 7 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। हिमालय के ऊंचे शिखरों पर जमी बर्फ अब सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग की शिकार नहीं है, बल्कि धरती के भीतर से निकलने वाली भूतापीय गर्मी भी इन्हें भीतर ही भीतर खोखला कर रही है। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान (WIHG) के वैज्ञानिकों ने अपने हालिया शोध में पाया है कि लद्दाख के ग्लेशियरों पर प्रकृति का दोहरा प्रहार हो रहा है।
फिजिकल ज्योग्रॉफी जर्नल में प्रकाशित यह रिपोर्ट बताती है कि बाहरी वातावरण का बढ़ता तापमान ग्लेशियर की ऊपरी सतह को नुकसान पहुंचा रहा है, जबकि भूगर्भीय ताप अंदरूनी हिस्से को गला रहा है।
लद्दाख के दुर्गम इलाकों में किए गए इस अध्ययन में एरोसोल, माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण और बर्फबारी की कमी जैसे कारकों को तो जिम्मेदार माना ही गया है, लेकिन सबसे चौंकाने वाला तथ्य ‘जियोथर्मल हीट’ का है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, लद्दाख का पुगा और चुमाथांग क्षेत्र पहले से ही उच्च भूतापीय ऊर्जा के लिए जाना जाता है, जहां 47°C से 87°C तक के गर्म पानी के सोते मिलते हैं। अब इसी तरह की भूगर्भीय हलचलें ग्लेशियरों के मास बैलेंस (बर्फ बनने और पिघलने का संतुलन) को बिगाड़ रही हैं।
डेटा की गहराई में जाएं तो आंकड़े डराने वाले हैं। पदम वैली के अध्ययन से पता चला है कि जो ग्लेशियर झीलों के सीधे संपर्क में हैं, उनके पिघलने की रफ्तार कहीं अधिक है। पिछले 30 सालों के रिकॉर्ड बताते हैं कि पदम ग्लेशियर करीब 784 मीटर पीछे हट गया है। वहीं, नाटियो नाला ग्लेशियर भी 324 मीटर तक खिसक चुका है। पदम ग्लेशियर के पास बनी झील का आकार भी 0.35 वर्ग किमी से बढ़कर अब 0.56 वर्ग किमी हो गया है।
लद्दाख के पेनसिलुंगपा ग्लेशियर की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है। साल 2023 और 2024 के दौरान 4800 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर सबसे ज्यादा बर्फ पिघली है। हालांकि, जिन हिस्सों पर मलबे की मोटी परत थी, वहां पिघलाव की गति थोड़ी धीमी रही, लेकिन डुरुंग डांग ग्लेशियर करीब 166 मीटर और पेनसिलुंगपा 80 मीटर पीछे जा चुका है।
ग्लेशियरों के इस तरह सिमटने से नदियों में पानी का बहाव अनियंत्रित हो रहा है। पार्वाचिक नदी का बहाव 2023 में अपने चरम पर था, जो निचले इलाकों के लिए किसी बड़ी आपदा का पूर्व संकेत हो सकता है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता का कहना है कि यह स्थिति लंबे समय में पानी की उपलब्धता पर संकट खड़ा कर सकती है। मास बैलेंस का नकारात्मक होना स्पष्ट करता है कि जितनी बर्फ सर्दियों में जम रही है, उससे कहीं ज्यादा गर्मियों में बह जा रही है। अगर यह सिलसिला नहीं थमा, तो आने वाले दशकों में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह बदल जाएगा और बाढ़ जैसी आपदाएं आम हो जाएंगी।









