उत्तराखंड में 452 में से 227 मदरसे बंद हो चुके हैं। मंत्री खजान दास ने कहा कि 31 अक्टूबर तक मान्यता न लेने वाले मदरसों पर कानूनी कार्रवाई होगी।
देहरादून (14 अक्टूबर) : उत्तराखंड में गैर-मान्यता प्राप्त और अवैध रूप से संचालित मदरसों पर धामी सरकार का कानूनी शिकंजा पूरी तरह कस गया है। प्रदेश में चिन्हित कुल 452 मदरसों में से 227 पर पहले ही ताला लटक चुका है, जबकि बाकी बचे संस्थानों को 31 अक्टूबर तक शिक्षा विभाग या अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता लेने का अंतिम अल्टीमेटम जारी किया गया है। कैबिनेट मंत्री खजान दास ने विभागीय समीक्षा बैठक के बाद साफ कर दिया कि तय समयसीमा में आवेदन न करने वाले और मानकों को ताक पर रखकर चल रहे संस्थानों को बख्शा नहीं जाएगा; उनके खिलाफ सीधे प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाई होगी।
227 मदरसे बंद, अक्टूबर अंत तक सख्त अल्टीमेटम
देहरादून स्थित दफ्तर में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की बैठक के दौरान कैबिनेट मंत्री खजान दास ने चल रही कार्रवाई का ब्योरा रखा। मंत्री के अनुसार, राज्य में 452 मदरसों के खिलाफ शुरू हुई जांच और कागजी सत्यापन के बाद अब तक 35 मदरसों को उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण और 76 मदरसों को स्कूल शिक्षा विभाग से विधिवत मान्यता दी जा चुकी है। यानी अब तक कुल 111 मदरसे ही सरकारी मानकों पर खरे उतरे हैं।
बैठक में अधिकारियों ने बताया कि 114 नए मदरसों के आवेदन विभाग के पास लंबित हैं, जिनकी जांच तेजी से की जा रही है। मंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि इन सभी आवेदनों की प्रक्रिया अक्टूबर के अंत तक पूरी की जाए, जिससे मान्यता प्राप्त मदरसों की संख्या बढ़कर करीब 190 तक पहुंच सके। हालांकि, सबसे बड़ा पेच उन 227 मदरसों का है जो जांच प्रक्रिया शुरू होते ही बंद पाए गए हैं। मंत्री ने दो टूक कहा कि यदि इन 227 मदरसों ने 31 अक्टूबर तक कानूनी मान्यता के लिए आवेदन नहीं किया, तो सरकार इनके खिलाफ सीलिंग और कानूनी कार्रवाई का चाबुक चलाएगी।
मान्यता के कड़े मानक और सत्यापन की प्रक्रिया
उत्तराखंड में अवैध मदरसों, संदिग्ध फंडिंग और आधुनिक पाठ्यक्रम की कमी को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के स्पष्ट निर्देशों के बाद सरकार ने मदरसों के लिए दोहरी मान्यता प्रणाली अनिवार्य की है, जिसके तहत संस्थानों को अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के साथ-साथ शिक्षा विभाग के मानकों (एनसीईआरटी पाठ्यक्रम, आधारभूत ढांचा और योग्य शिक्षक) पर खरा उतरना जरूरी है।
प्रशासनिक जांच का दायरा बढ़ने और कागजात पूरे न होने की वजह से ही 227 मदरसों ने पहले ही अपने शटर गिरा दिए हैं। सरकार का रुख साफ है कि धार्मिक शिक्षा की आड़ में बिना पंजीकरण के किसी भी संस्थान को चलने की छूट नहीं दी जाएगी। 31 अक्टूबर की समयसीमा तय करके प्रशासन ने उन सभी मदरसों को अंतिम मौका दिया है जो अब तक मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली और सरकारी सत्यापन से बचते आ रहे थे।
डेडलाइन के बाद सीधी तालाबंदी और बजट समीक्षा
समीक्षा बैठक में मदरसों के नियमन के अलावा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विकास कार्यों की समयसीमा भी तय की गई। मंत्री खजान दास ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिन जनकल्याणकारी योजनाओं का लोकार्पण मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से कराया जाना है, उन्हें 15 दिसंबर 2026 से पहले हर हाल में पूरा किया जाए। वहीं, प्रस्तावित नई योजनाओं का शिलान्यास 15 नवंबर 2026 से पहले कराने के लिए सभी औपचारिकताएं पूरी करने के निर्देश दिए गए।
बैठक में सरकारी धन के दुरुपयोग और लेटलतीफी पर भी कड़ा प्रहार किया गया। मंत्री ने दो टूक कहा कि जिन विकास परियोजनाओं के लिए बजट जारी हुआ था, लेकिन काम शुरू न होने के कारण धनराशि अटकी पड़ी है, उसे फौरन सरकारी खजाने में वापस जमा कराया जाए। सरेंडर की गई इस राशि को अन्य जरूरी जनहित योजनाओं में लगाया जाएगा। साफ है कि सरकार एक तरफ अल्पसंख्यक कल्याण का बजट धरातल पर उतारने में जुटी है, तो दूसरी तरफ बिना मान्यता वाले मदरसों को बंद कर कड़ा संदेश दे रही है।









