उत्तराखंड में मदरसों के लिए नया पाठ्यक्रम तैयार। बिना मान्यता धार्मिक शिक्षा पर 5 लाख जुर्माना और तालाबंदी का प्रावधान। जानिए सरकार का नया नियम।
देहरादून (30 अक्टूबर) : उत्तराखंड में अब बिना मान्यता और मनमाने ढर्रे पर धार्मिक तालीम चलाने वाले संस्थानों पर शिकंजा कस दिया गया है। प्रदेश सरकार ने मदरसों समेत सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए धार्मिक शिक्षा का मानकीकृत पाठ्यक्रम तैयार कर लिया है, जिसे कक्षा एक से आठवीं तक इसी सप्ताह लागू किया जा रहा है।
विधानसभा से पारित अल्पसंख्यक शिक्षा संशोधन विधेयक के तहत तय नियमों का उल्लंघन करने या गैर-मान्यता प्राप्त तरीके से धार्मिक शिक्षा देने पर सीधे 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगेगा। इसके साथ ही प्रशासन को ऐसे संस्थानों को सील करने और वहां रिसीवर बैठाने का भी कानूनी अधिकार मिल गया है। धार्मिक शिक्षा के नियमन को लेकर ऐसा कड़ा कानूनी ढांचा तैयार करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है।
बिना मान्यता मजहबी तालीम पर पांच लाख का जुर्माना
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण द्वारा तैयार किया गया यह नया पाठ्यक्रम कक्षा एक से आठवीं तक के लिए इसी सप्ताह से अनिवार्य किया जा रहा है। वहीं, नौवीं से 12वीं तक का पाठ्यक्रम भी तैयार हो चुका है, जिसका विमोचन जल्द मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी करेंगे। मौजूदा शैक्षणिक सत्र का आधा समय निकल चुका है, इसलिए इस सत्र में अध्ययन सामग्री ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से उपलब्ध कराई जाएगी और इसी आधार पर परीक्षाएं आयोजित होंगी।
पुस्तकों का औपचारिक प्रकाशन अगले सत्र में बजट आवंटन के बाद होगा। नए कानून के तहत साफ चेतावनी दी गई है कि जो भी अल्पसंख्यक संस्थान निर्धारित पाठ्यक्रम से इतर या बिना मान्यता धार्मिक शिक्षा देंगे, उन पर 5 लाख रुपये का आर्थिक दंड ठोंका जाएगा और जरूरत पड़ने पर संस्थान पर ताला जड़ दिया जाएगा।
मदरसा बोर्ड भंग होने के बाद आधे मदरसे बंद
राज्य में पहले मदरसा बोर्ड के अधीन कुल 452 मदरसे पंजीकृत थे। धामी सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड को समाप्त कर ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ गठित किए जाने के बाद से जमीनी स्तर पर व्यापक उलटफेर हुआ है। प्राधिकरण की सख्त शर्तों के चलते पुराने 452 मदरसों में से आधे से अधिक मदरसे बंद हो चुके हैं।
अब तक केवल 35 संस्थानों ने ही अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से नई मान्यता ली है। वहीं, करीब 80 संस्थानों ने सामान्य शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त की है और 100 से अधिक संस्थानों के आवेदन प्रक्रिया में हैं। खास बात यह है कि अब केवल मुस्लिम ही नहीं, बल्कि सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समाज के शिक्षण संस्थानों को भी इसी एक नियामक व्यवस्था के दायरे में लाया गया है।
नियम तोड़ने पर सील होंगे अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान
तैयार किए गए नए पाठ्यक्रम में मजहबी तालीम के साथ-साथ नैतिक मूल्य, भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा, डिजिटल व्यवहार, नशे के खिलाफ जागरूकता और सामाजिक भाईचारे जैसे विषयों को अनिवार्य रूप से जोड़ा गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया है कि सरकार का मुख्य लक्ष्य अल्पसंख्यक संस्थानों के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा देकर मुख्यधारा और रोजगार से जोड़ना है।
इधर, अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी ने बताया कि धार्मिक पाठ्यक्रम का निर्माण विषय विशेषज्ञों और धर्मगुरुओं की संयुक्त समितियों द्वारा किया गया है, जिसके लिए शिक्षा विभाग से अलग से किसी अनापत्ति की आवश्यकता नहीं है। जो संस्थान नियमों की अवहेलना करेंगे, उनके खिलाफ सीलिंग और जब्ती की सीधी कार्रवाई की जाएगी।









