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उत्तराखंड शिक्षक भर्ती पर हाईकोर्ट सख्त, अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति पर न्यायमूर्ति ने जताई भारी हैरानी

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नैनीताल, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश की प्राथमिक शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में बरती गई कथित मनमानी और अनियमितताओं पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए चयन समिति की भूमिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान इस तथ्य पर विस्मय प्रकट किया कि आखिर किस आधार पर चयन समिति ने उन अभ्यर्थियों की नियुक्ति की सिफारिश कर दी, जिन्हें सीबीएसई (CBSE) और एनसीटीई (NCTE) पहले ही अपात्र घोषित कर चुके थे।

अदालत ने शिक्षा निदेशालय को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों की सेवा में बिना किसी बाधा के, उन 11 वंचित अभ्यर्थियों के लिए नियुक्ति का रास्ता निकाला जाए जिन्होंने योग्यता के बावजूद सिस्टम की खामियों के कारण अवसर खो दिया था। इन अभ्यर्थियों के लिए कोर्ट के पिछले आदेशों के बाद विभाग ने पहले ही पद रिक्त रखे हुए हैं।

मामले की पृष्ठभूमि साल 2016 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी है, जहाँ विनय कुमार और अन्य अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नियम विरुद्ध तरीके से कई अपात्र लोगों को प्राथमिक शिक्षक के पदों पर बैठा दिया गया, जबकि मेरिट और योग्यता रखने वाले उम्मीदवार बाहर रह गए। इस कानूनी लड़ाई में शिक्षा विभाग के साथ-साथ उन शिक्षकों को भी प्रतिवादी बनाया गया है जो वर्तमान में सेवारत हैं।

विवाद के बीच शिक्षा विभाग ने नवंबर 2025 में सहायक अध्यापक प्राथमिक के पदों के लिए नई विज्ञप्ति जारी की थी। हाईकोर्ट ने इसी नई भर्ती प्रक्रिया में से 11 रिक्तियों को सुरक्षित रखने का आदेश दिया था ताकि 2016 के पीड़ित याचिकाकर्ताओं को वहां समायोजित किया जा सके। कोर्ट ने साफ किया कि योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती।

सुनवाई के दौरान विभागीय सचिव ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ‘देवेश शर्मा बनाम भारत संघ’ मामले का संदर्भ देते हुए याचिकाकर्ताओं की पात्रता पर सवाल उठाए। सरकार का तर्क था कि बीएड डिग्री धारक होने के कारण ये अभ्यर्थी अपात्र हैं, लेकिन याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। वकील ने दलील दी कि राज्य सरकार स्वयं पहले स्वीकार कर चुकी है कि 2016 के विज्ञापन के मानकों के अनुसार ये सभी अभ्यर्थी पूरी तरह पात्र थे।

न्यायालय ने इस विरोधाभास को देखते हुए राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर इस पूरे प्रकरण का समाधान निकालने का अल्टीमेटम दिया है। सरकारी मशीनरी को अब यह स्पष्ट करना होगा कि नियमों की अनदेखी कर अयोग्य लोगों को व्यवस्था में कैसे प्रवेश मिला। मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई अब 8 अप्रैल 2026 को होनी तय की गई है, जिस पर प्रदेश भर के बेरोजगारों की नजरें टिकी हैं।

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