देहरादून, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड में दशक की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कवायद ‘जनगणना’ को लेकर सरकारी मशीनरी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। जनगणना निदेशालय ने सूक्ष्म नियोजन (Micro Planning) के तहत पूरे प्रदेश को 32 हजार भौगोलिक हिस्सों में बांट दिया है।
जनगणना निदेशक ईवा आशीष श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया है कि डेटा की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए हर 800 की आबादी या 200 घरों पर एक विशिष्ट ब्लॉक बनाया गया है। प्रशासन की सख्ती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिन राजस्व ग्रामों में महज एक या दो व्यक्ति निवास कर रहे हैं, उन्हें भी एक स्वतंत्र ब्लॉक के रूप में चिह्नित कर विशेष गणना की जाएगी।
इस महा-अभियान को जमीन पर उतारने के लिए 30 हजार सरकारी कर्मचारियों की फौज तैनात की गई है। इन प्रगणकों और पर्यवेक्षकों का प्रशिक्षण सोमवार, 6 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है।
राज्यभर की 239 तहसीलों और अन्य सरकारी परिसरों में तीन दिवसीय ट्रेनिंग मॉड्यूल के जरिए कर्मचारियों को डेटा कलेक्शन के डिजिटल और फिजिकल तरीकों के गुर सिखाए जाएंगे। निदेशक के अनुसार, ट्रेनिंग के लिए मास्टर ट्रेनर्स की तैनाती पहले ही की जा चुकी है ताकि फील्ड वर्क में कोई त्रुटि न रहे।
जनगणना का टाइम टेबल दो महत्वपूर्ण चरणों में विभाजित है। पहला अवसर आम जनता के लिए है, जिसमें 10 अप्रैल से 25 अप्रैल तक लोग जनगणना विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर जाकर ‘स्वगणना’ (Self Enumeration) कर सकते हैं। इसके ठीक बाद, 25 अप्रैल से 24 मई के बीच ‘भवन गणना’ यानी हाउस लिस्टिंग का फिजिकल वेरिफिकेशन शुरू होगा।
इस दौरान घर-घर आने वाले कर्मचारी निवासियों से 5 श्रेणियों में कुल 33 सवाल पूछेंगे। इसमें मकान की निर्माण सामग्री, परिवार के मुखिया का विवरण, पेयजल-बिजली की उपलब्धता, बैंक खाते, वाहनों की संख्या और संचार साधनों जैसे व्यक्तिगत व सामाजिक पहलुओं पर जानकारी जुटाई जाएगी।
इस बार की जनगणना केवल सरकारी आंकड़ों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के वजूद की लड़ाई भी बन गई है। प्रेस क्लब में आयोजित ‘अपनी गणना-अपने गांव’ बैठक में विशेषज्ञों ने गंभीर चेतावनी दी है। वर्तमान पलायन के ट्रेंड को देखते हुए आशंका है कि यदि प्रवासियों ने खुद को अपने मूल गांवों में दर्ज नहीं कराया, तो आगामी परिसीमन में पहाड़ की राजनीतिक शक्ति का सूर्य अस्त हो सकता है।
आंकड़ों का गणित बताता है कि यदि 2027 की जनसंख्या को आधार माना गया, तो उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जैसे 9 पर्वतीय जिलों की विधानसभा सीटें घटकर मात्र 39 रह सकती हैं।
इसके विपरीत, मैदानी जिलों (देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल का कुछ हिस्सा) में जनसंख्या घनत्व बढ़ने के कारण उनकी सीटें 66 तक पहुंचने का अनुमान है। इस असंतुलन को रोकने के लिए ‘संयोजक मंडल’ का गठन किया गया है, जो करीब 6 लाख प्रवासियों को उनके पैतृक गांवों से जोड़ने का काम करेगा।
जनगणना निदेशालय ने स्पष्ट किया है कि पोर्टल पर दी गई सभी जानकारियां पूरी तरह गोपनीय रहेंगी, इसलिए प्रवासियों को बिना किसी डर के अपने मूल निवास की जानकारी दर्ज करानी चाहिए ताकि बजट आवंटन और विकास योजनाओं में पहाड़ का हक मारा न जाए।









