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देहरादून : हार गई पुलिस, जीत गई ममता, बेटे को कुचलने वाले डंपर को मां ने 18 महीने बाद खोजा

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देहरादून, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। राजधानी देहरादून की पुलिसिंग और सिस्टम की संवेदनहीनता को एक मां के संघर्ष ने आईना दिखा दिया है। जिस केस को पुलिस ने ‘अनसुलझा’ मानकर फाइलों में दफन कर दिया था, उस केस के आरोपी तक एक मां ने डेढ़ साल की कड़ी मशक्कत के बाद खुद पहुंचकर खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सहस्रधारा रोड स्थित विश्वनाथ एन्क्लेव की रहने वाली ललिता चौधरी का 18 साल का बेटा क्षितिज चौधरी अब इस दुनिया में नहीं है। 16 फरवरी 2024 को प्रेमनगर के पास एक अज्ञात डंपर ने क्षितिज को उस वक्त कुचल दिया था जब वह पैदल जा रहा था। अगले दिन अस्पताल में इलाज के दौरान क्षितिज की सांसें थम गईं। घर का चिराग बुझ चुका था, लेकिन असली संघर्ष तो बेटे की मौत के बाद शुरू हुआ।

प्रेमनगर पुलिस का रवैया शुरू से ही टालमटोल वाला रहा। आलम यह था कि जब क्षितिज के फूल चुगने का दिन था, तब उसकी मां को रोते-बिलखते थाने के चक्कर काटने पड़े, क्योंकि पुलिस बिना परिजनों के पहुंचे मुकदमा दर्ज करने को तैयार नहीं थी। काफी दबाव के बाद FIR तो दर्ज हुई, लेकिन इंसाफ की उम्मीदें जल्द ही पुलिसिया तंज के नीचे दब गईं।

विवेचना के दौरान जब ललिता चौधरी ने जांच अधिकारी से प्रगति जाननी चाही, तो उन्हें दो टूक जवाब मिला। पुलिसकर्मी ने कथित तौर पर कहा, “मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है जो इतनी जल्दी कार्रवाई कर दूं, बिना नंबर के वाहन ढूंढना हमारे बस का नहीं है।” अंततः पुलिस ने डंपर और उसके चालक का पता लगाने में असमर्थता जताते हुए केस में फाइनल रिपोर्ट (FR) लगाकर उसे बंद कर दिया।

पेशे से ब्यूटीशियन ललिता चौधरी ने पुलिस की इस हार को अपनी हार नहीं माना। उन्होंने खुद जांच की कमान संभाली। वह महीनों तक उन सड़कों की खाक छानती रहीं जहां हादसा हुआ था। उन्होंने आसपास के दर्जनों सीसीटीवी फुटेज खुद चेक किए। इस दौरान उन्होंने 10 संदिग्ध वाहनों के नंबर जुटाकर पुलिस को सौंपे, लेकिन पुलिस ने उन पर काम करने की जहमत नहीं उठाई।

करीब 18 महीने के लंबे इंतजार और खुद की गई ‘समानांतर जांच’ के बाद ललिता ने उस खूनी डंपर और उसके मालिक अंकित चौहान का सुराग ढूंढ निकाला। शनिवार को ललिता साक्ष्यों की पोटली लेकर एसएसपी कार्यालय पहुंचीं। मां के इस अदम्य साहस को देख पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। एसएसपी प्रमेंद्र सिंह डोबाल ने तत्काल प्रभाव से केस की फाइल दोबारा खोलने और मामले की गहन जांच के निर्देश दिए हैं। अब सवाल यह है कि जो काम संसाधनों से लैस पुलिस डेढ़ साल में नहीं कर पाई, वो एक बेबस मां ने कैसे कर दिखाया?

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