देहरादून, 10 मई 2026 (दून हॉराइज़न)। राजधानी के चंद्रमणि क्षेत्र में प्रस्तावित नई पेयजल योजना विवादों के घेरे में आ गई है। अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा उत्तराखंड ने इस योजना के तहत श्मशान घाट की भूमि पर ट्यूबवेल और पानी की टंकी बनाने के प्रस्ताव पर कड़ा ऐतराज जताया है।
महासभा का तर्क है कि जिस भूमि का उपयोग अंतिम संस्कार के लिए किया जाता है, वहां से पेयजल की आपूर्ति करना धार्मिक मान्यताओं और जनभावनाओं के साथ सीधा खिलवाड़ है।
देहरादून: महासभा के अध्यक्ष मनमोहन शर्मा के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने शनिवार को जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन प्रेषित किया। ज्ञापन में मांग की गई है कि चंद्रमणि पेयजल योजना की वर्तमान डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए। महासभा ने स्पष्ट किया कि मरघट की भूमि पर किसी भी प्रकार का पेयजल निर्माण कार्य स्वीकार्य नहीं होगा।
धार्मिक मान्यताओं और राजस्व रिकॉर्ड का हवाला
अध्यक्ष मनमोहन शर्मा ने सरकार और संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे प्रशासनिक ‘हठधर्मिता’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि सरकारी राजस्व अभिलेखों में यह भूमि स्पष्ट रूप से ‘मरघट’ के रूप में दर्ज है।
हिंदू संस्कृति में श्मशान की भूमि को अशुद्ध माना जाता है, ऐसे में वहां से निकलने वाले पानी की आपूर्ति घरों में करना समाज के लिए असहज और अपमानजनक है। महासभा ने आरोप लगाया कि प्रशासन जनता की आस्था की अनदेखी कर सरकारी धन का दुरुपयोग करने की राह पर है।
आंदोलन की चेतावनी और मुख्य उपस्थिति
महासभा ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में चेतावनी दी है कि यदि इस विवादित स्थल पर निर्माण कार्य रोकने की कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आम जनता को लामबंद कर उग्र आंदोलन के लिए विवश होंगे। उन्होंने कहा कि भविष्य में होने वाले किसी भी जन-असंतोष के लिए सीधे तौर पर राज्य सरकार और संबंधित विभाग जिम्मेदार होंगे।
ज्ञापन सौंपने के दौरान वरिष्ठ समाजसेवी लालचंद शर्मा, मुकुल शर्मा, सीताराम नौटियाल, मनोज शर्मा और पीयूष गॉड समेत कई पदाधिकारी मौजूद रहे। इसके अलावा विजेंद्र प्रसाद ममगई, रजनी, रमेश मांगू, सुभाष धस्माना, सतीश शर्मा और संजय मिश्रा ने भी योजना को जनभावनाओं के विपरीत बताते हुए इस पर रोक लगाने की मांग की है।









