देहरादून, 10 मई 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड के खेल जगत में ‘वीरू’ के नाम से मशहूर डॉ. विरेन्द्र सिंह रावत की कहानी केवल एक खिलाड़ी के संघर्ष की नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति की मिसाल है। 19 एक्सीडेंट, गरीबी और सिस्टम के भ्रष्टाचार को झेलने के बाद भी उन्होंने राज्य के हजारों निर्धन और होनहार खिलाड़ियों को तराशना जारी रखा है। 57 वर्ष की आयु में भी उनका जोश कम नहीं हुआ है, जिसका परिणाम है कि आज वे 27 हजार युवाओं के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं।
बचपन की चुनौतियां और फुटबॉल का जुनून
पौड़ी गढ़वाल के कुलासु गांव में 14 फरवरी 1970 को जन्मे वीरू का शुरुआती जीवन बेहद अभावों में बीता। पिता स्वर्गीय कैप्टन चंद्र सिंह रावत प्रथम गढ़वाल राइफल्स में थे, लेकिन बड़े परिवार का पालन-पोषण एक छोटी झोपड़ी में होता था। जन्म के समय स्वास्थ्य बेहद खराब होने के बावजूद उन्होंने मौत को मात दी। 1970 में जब परिवार देहरादून के धर्मपुर में एक गौशाला के 8×8 के कमरे में रहने आया, तो वहां से उनके संघर्ष का नया अध्याय शुरू हुआ। अपने दादा शेर सिंह रावत (ब्रिटिश गढ़वाल राइफल्स के दिग्गज गोलकीपर) की कहानियों से प्रेरित होकर वीरू ने 5 साल की उम्र में फुटबॉल थाम ली थी।
भ्रष्टाचार की मार और संघर्ष के दिन
वीरू की प्रतिभा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1986 में उन्होंने अंडर-16 और फिर अंडर-19 नेशनल खेला। हालांकि, खेल प्रशासन के भ्रष्टाचार ने उन्हें गहरा घाव दिया, जब उनका नेशनल सर्टिफिकेट किसी और को बेच दिया गया। आर्थिक तंगी ऐसी थी कि उन्हें 50 रुपये में ट्यूशन पढ़ाना पड़ा और डीएवी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान क्लर्क की नौकरी और किताबें तक बेचनी पड़ीं। सरकारी नौकरियों के लिए जब उनसे घूस मांगी गई, तो उन्होंने हार मानने के बजाय निजी स्कूलों में अकाउंटेंट की नौकरी की और खेल के प्रति अपना समर्पण बनाए रखा।
राज्य आंदोलन और कानूनी लड़ाई
वीरू केवल मैदान के खिलाड़ी नहीं रहे, बल्कि 1994 के उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी सक्रिय रहे। मुजफ्फरनगर कांड के दौरान अपने मित्र को आंखों के सामने खोने के बाद उन्होंने तीन दिन गन्ने के खेतों में छुपकर अपनी जान बचाई थी। 2011 में उन्होंने अपनी पक्की नौकरी छोड़कर देहरादून फुटबॉल एकेडमी (DFA) की नींव रखी। इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा, जब 2015 में एक फर्जी स्पॉन्सर ने उनकी एकेडमी पर कब्जा करने की कोशिश की। ढाई साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट ने उन्हें बेगुनाह करार दिया।
बॉलीवुड से पीएचडी तक का सफर
वीरू का प्रभाव केवल मैदान तक सीमित नहीं रहा। साल 2012 में उन्होंने करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में फुटबॉल कोच की भूमिका निभाई और वरुण धवन व सिद्धार्थ मल्होत्रा को प्रशिक्षित किया। हाल ही में वे परेश रावल की फिल्म ‘पास्ट टेंस’ में भी नजर आए हैं। उनके इसी समर्पण के लिए 2022 में मुंबई की कॉमनवेल्थ वोकेशनल यूनिवर्सिटी ने उन्हें पीएचडी की मानद उपाधि प्रदान की। आज वे नशे के खिलाफ अभियान चलाते हुए प्रतिदिन सुबह 4:30 बजे युवाओं को मैदान में प्रशिक्षण देते नजर आते हैं।









