देहरादून, 4 जून 2026 (दून हॉराइज़न)। दून मेडिकल कॉलेज और अस्पताल प्रबंधन ने हाल ही में सामने आए धोखाधड़ी के मामलों के बाद प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव किए हैं। आयुष्मान योजना के तहत भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के साथ ही लाखों रुपये के मेस घोटाले में संलिप्त लोगों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया गया है।
प्राचार्य डॉ. गीता जैन और चिकित्सा अधीक्षक (एमएस) डॉ. आरएस बिष्ट के निर्देशों के बाद अब दून अस्पताल में आयुष्मान योजना के तहत भर्ती होने वाले मरीजों को निजी अस्पतालों की तर्ज पर हाथों में टैग पहनाया जाएगा।
यह टैग डिस्चार्ज के समय ही वापस लिया जाएगा। वार्डों में सघन सत्यापन के लिए मरीज की फाइल में आधार कार्ड और आयुष्मान कार्ड की फोटोकॉपी लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। निगरानी को और बेहतर बनाने के लिए नर्सिंग इंचार्ज और आयुष्मान मित्रों का एक समन्वय ग्रुप भी तैयार किया जा रहा है।
आयुष्मान फर्जीवाड़े के मुख्य आरोपी मंजीत ने अस्पताल प्रबंधन के दबाव के बाद इलाज पर खर्च हुए 1.35 लाख रुपये जमा करा दिए हैं। साथ ही एक माफीनामा भी सौंपा है। आरोपी की पुरानी फाइल निरस्त कर दी गई है। डिप्टी एमएस डॉ. एनएस बिष्ट द्वारा दर्ज कराए गए मामले के आधार पर पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही है।
मेस घोटाले में निदेशालय स्तर पर जांच शुरू
दूसरी तरफ, दून मेडिकल कॉलेज के मेस (कैंटीन) घोटाले में रोज नए तथ्य सामने आ रहे हैं। इस मामले में निदेशक डॉ. अजय आर्य ने कार्रवाई करते हुए चार कर्मचारियों को अन्य मेडिकल कॉलेजों में अटैच कर दिया है। इन कर्मचारियों ने महानिदेशालय को भेजे पत्र में मेस मैनेजर द्वारा वार्डन, डॉक्टरों और उनके परिजनों के बैंक खातों में भेजे गए लाखों रुपये के लेनदेन के स्क्रीनशॉट संलग्न किए हैं।
इन स्क्रीनशॉट्स में एक डॉक्टर की पत्नी के खाते में 1.05 लाख, अन्य डॉक्टरों के खाते में 25 हजार से लेकर 65 हजार रुपये तक किश्तों में भेजे जाने के प्रमाण मौजूद हैं। एक डॉक्टर को पांच लाख रुपये का चेक दिए जाने की बात भी सामने आई है। निदेशालय अब मैनेजर के बयानों और इन स्क्रीनशॉट्स का मिलान कर डॉक्टरों और कर्मचारियों से पूछताछ की तैयारी कर रहा है।
लेखा विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल
इस मामले में इंटर्न और पीजी छात्रों की एएलएस (ALS) और बीएलएस (BLS) ट्रेनिंग के खाने का भुगतान सीधे मेस खाते से मैनेजर को किए जाने का मामला भी तूल पकड़ रहा है। प्रशासनिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर किए गए इस भुगतान से लेखा विभाग पर सवाल उठ रहे हैं।
शुरुआती जांच में पता चला है कि मेस मैनेजर ने छात्रों को कम फीस का लालच देकर सीधे अपने पास पैसे जमा कराए। वहीं, डॉक्टरों और कर्मचारियों को निवेश पर मोटे मुनाफे या पार्टनरशिप का झांसा दिया था।









