देहरादून : सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक पोस्ट, विवादित ऑडियो-वीडियो साझा करने के मामले में सलाखों के पीछे गए पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर को अदालत से बड़ी राहत मिल गई है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) रवि प्रकाश की अदालत ने मामले की गंभीरता और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पूर्व विधायक की जमानत अर्जी मंजूर कर ली। जेल से बाहर आएंगे राठौर।
अदालत ने आरोपी पूर्व विधायक को एक लाख रुपए के व्यक्तिगत बंधपत्र और समान राशि के दो जमानतदार पेश करने की शर्त पर तुरंत रिहा करने के आदेश जारी किए हैं। कोतवाली डालनवाला में दर्ज इस मुकदमे में पुलिस ने इसी महीने 14 जून 2026 को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 308 (6) बढ़ाई थी। धारा जुड़ते ही पुलिस ने आनन-फानन में एक्शन लिया था। हवालात पहुंचे पूर्व विधायक।
बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि पूर्व विधायक जांच में लगातार सहयोग कर रहे थे। उन्हें पहले बीएनएसएस की धारा 35 (3) के तहत बकायदा नोटिस देकर छोड़ा गया था। जिन धाराओं में पुलिस ने कार्रवाई दिखाई है, वे ज्यादातर जमानती प्रकृति की हैं। सरकारी वकील ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। अभियोजन का कहना था कि विवेचना जारी है और आरोप बेहद गंभीर हैं।
अदालत ने पुलिस के तमाम सरकारी अभिलेखों और केस डायरी का गहन अवलोकन किया। सीजेएम कोर्ट ने माना कि केस की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को जमानत पर रिहा करना न्यायसंगत है। अतिरिक्त जोड़ी गई धारा भी जमानती ही है। जमानत मंजूर हुई।
पूरे विवाद की जड़ अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़ी कड़ियों में छिपी है। पूर्व विधायक सुरेश राठौर और उनकी कथित पत्नी व अभिनेत्री उर्मिला सनावर के खिलाफ हरिद्वार के झबरेड़ा, बहादराबाद समेत देहरादून के नेहरू कॉलोनी और डालनवाला थानों में एक के बाद एक कई मुकदमे दर्ज किए गए थे। दोनों पर सोशल मीडिया पर कई विवादित ऑडियो और वीडियो वायरल करने का सीधा आरोप लगा था।
वायरल वीडियो और रिकॉर्डिंग में उत्तराखंड के कई रसूखदार बीजेपी नेताओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक बातें कही गई थीं। नेताओं की छवि खराब करने की कोशिश हुई थी। उत्तराखंड की राजनीति में भूचाल आ गया। ठंडे बस्ते में जा चुका अंकिता भंडारी मर्डर केस अचानक राज्य के सियासी गलियारों में फिर सुलग उठा। जनता सड़कों पर उतर आई।
ऑडियो में एक कथित ‘वीआईपी’ का जिक्र होने से लोगों का गुस्सा भड़क गया था। सरकार विरोधी नारों से वादियां गूंज उठी थीं। हर कोई जानना चाहता था कि आखिर वो ‘वीआईपी’ कौन है। राजनीतिक और सामाजिक पारा चढ़ता देख मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सीधे अंकिता भंडारी के माता-पिता से मुलाकात की थी। इसी साल 9 जनवरी को सीएम धामी ने इस पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की बड़ी संस्तुति कर दी थी।
इधर बीजेपी के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम ने 5 जनवरी को ही देहरादून के डालनवाला थाने में तहरीर दी थी। शिकायत में आरोप था कि सुरेश राठौर और उर्मिला सनावर सोची-समझी साजिश के तहत झूठे मामले में फंसाने के लिए बीजेपी नेताओं को बदनाम कर रहे हैं। देहरादून से लेकर हरिद्वार तक मुकदमों की बाढ़ आ गई।
डालनवाला पुलिस और एसओजी की संयुक्त टीम ने मिलकर कार्रवाई की थी। बीती 14 जून को पुलिस ने हरिद्वार के बुग्गावाला इलाके में दबिश देकर पूर्व विधायक को हिरासत में लिया था। लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तारी हुई थी। कोर्ट ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजा था। सलाखों के पीछे दिन कटे।
मामले की गूंज नैनीताल हाईकोर्ट तक पहुंच चुकी है। हाईकोर्ट ने राहत देते हुए सुरेश राठौर के खिलाफ दर्ज कुल 4 एफआईआर में से 2 मुकदमों को पूरी तरह रद्द कर दिया था। बाकी बचे दो मामलों में उच्च न्यायालय ने पुलिस को तफ्तीश जारी रखने के आदेश दिए थे। इन्हीं मामलों के आधार पर डालनवाला पुलिस ने आगे की विधिक कार्रवाई को अंजाम दिया था।
विवादित बयानों के चलते सुर्खियां बटोरने वाले सुरेश राठौर को भाजपा संगठन बहुत पहले ही पार्टी से निष्कासित कर चुका है। उर्मिला सनावर के साथ हुई बातचीत के लीक टेप ने सूबे की सियासत को पूरी तरह गर्मा कर रख दिया है। फिलहाल इस मामले में सुरेश राठौर के वकीलों ने जमानत की कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं।









