देहरादून, 27 जून 2026 (दून हॉराइज़न)।
Haridwar Land Scam : विजिलेंस की आठ अलग-अलग टीमों ने शुक्रवार सुबह कोर्ट से सर्च वारंट लेकर दिल्ली, लखनऊ, रुद्रप्रयाग, हरिद्वार, देहरादून और ऋषिकेश में एक साथ दबिश दी। हरिद्वार नगर निगम के बहुचर्चित जमीन घोटाले में तत्कालीन नगर आयुक्त आईएएस वरुण चौधरी समेत 10 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। विजिलेंस की डिप्टी एसपी हर्षवर्धनी सुमन को इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच सौंपी गई है।
हरिद्वार नगर निगम ने अपने उपयोग के लिए किसानों से 15 करोड़ रुपये की कृषि भूमि खरीदी थी। तत्कालीन अधिकारियों ने शासन की आंखों में धूल झोंकते हुए चंद दिनों के भीतर इस जमीन का भू-उपयोग कृषि से बदलकर आवासीय कर दिया। रातों-रात सरकारी रिकॉर्ड में इस जमीन की कीमत 54 करोड़ रुपये पहुंच गई। भू-उपयोग बदलते ही सिर्फ एक दिन के भीतर किसानों के साथ एग्रीमेंट कर जमीन की खरीद प्रक्रिया पूरी कर ली गई।
विजिलेंस ने शासन से अनुमति मिलने के बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपनी एफआईआर में नगर निगम के उन तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों को नामजद किया है जो 54 करोड़ की इस डील के वक्त सीधे तौर पर निगम में तैनात थे।
आईएएस वरुण चौधरी के साथ ही तत्कालीन सहायक नगर आयुक्त रवींद्र कुमार दयाल और कर अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट पर विधिक कार्रवाई शुरू हो गई है। प्रभारी अधिशासी अभियंता आनंद सिंह मिश्रा, संपत्ति क्लर्क वेदपाल और मानचित्रकार दिनेश चंद्र कांडपाल का नाम भी आरोपियों की सूची में शामिल है।
सरकारी बाबुओं के साथ जिन निजी व्यक्तियों की जमीन खरीदी गई उन पर भी विजिलेंस ने शिकंजा कसा है। सुमन देवी, जितेंद्र कुमार, अभिषेक यादव और सुजीत कुमार सिंह को सीधे तौर पर इस एफआईआर में नामजद किया गया है। विजिलेंस की टीमें इन सभी के आठ अलग-अलग ठिकानों पर लगातार तफ्तीश में जुटी हैं।
देहरादून में आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ है। अधिवक्ता संजीव शर्मा और सौरभ दुसेजा ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय में दोष सिद्ध होने पर इन आरोपियों को भारी जुर्माने के साथ अधिकतम दस साल कैद की सजा काटनी पड़ सकती है। धारा 318(4) के तहत छल करने और बेईमानी से संपत्ति हस्तांतरण के मामले में सात वर्ष तक के कारावास का सख्त प्रावधान है।
एफआईआर में बीएनएस की धारा 61 भी लगाई गई है जो एक से अधिक लोगों के मिलकर आपराधिक साजिश रचने पर लगती है। इस धारा में सजा मुख्य अपराध की प्रकृति से तय होती है और दोष सिद्ध होने पर चार से दस वर्ष जेल का प्रावधान मौजूद है।
घोटाले में तत्कालीन डीएम कर्मेंद्र सिंह पर मुकदमा दर्ज न होना सियासी गलियारों में गहरी चर्चा का विषय बना हुआ है। कार्मिक विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एफआईआर से पहले पूरे प्रकरण की सघन जांच कर आपराधिक मंशा और प्रशासनिक लापरवाही का बारीक अंतर स्पष्ट किया है। इस विभागीय समीक्षा में तत्कालीन डीएम कर्मेंद्र सिंह सीधे तौर पर आपराधिक साजिश के बजाय प्रशासनिक लापरवाही के दोषी पाए गए हैं।
केंद्र सरकार से आईएएस वरुण चौधरी को सीधे बर्खास्त करने की कड़ी सिफारिश भेजी जा चुकी है। तत्कालीन डीएम कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ दीर्घ शास्ति यानी मेजर पनिशमेंट की आधिकारिक संस्तुति की गई है। आरोपी अधिकारी गिरफ्तारी से बचने की जद्दोजहद में हैं। विजिलेंस की टीमें नामजद आरोपियों की धरपकड़ के लिए आगे की रणनीति पर काम कर रही हैं।









