देहरादून, 2 जुलाई 2026 (दून हॉराइज़न)।
Madarsa Board Uttarakhand : उत्तराखंड में लंबे समय से चली आ रही मदरसा शिक्षा की पुरानी प्रणाली बुधवार को पूरी तरह से निरस्त कर दी गई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सीएम आवास में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का आधिकारिक शुभारंभ किया। इसी के साथ राज्य मदरसा बोर्ड स्वतः ही भंग हो गया। नया प्राधिकरण अस्तित्व में आते ही मदरसों की कार्यप्रणाली और उनके पाठ्यक्रम का संचालन पूरी तरह से बदल जाएगा।
राज्य सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान विधेयक-2025 को धरातल पर उतारते हुए इस नई संस्था को पूर्ण विधिक मान्यता दे दी है। यह सख्त कदम उठाने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है। सरकार ने पहले चरण में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को सीधे तौर पर मान्यता प्रमाण पत्र वितरित कर दिए हैं।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक संस्था का गठन भर नहीं है बल्कि राज्य के प्रत्येक बच्चे के सुरक्षित भविष्य की मजबूत नींव तैयार करने का प्रशासनिक प्रयास है। मदरसों से पास होने वाले छात्र हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के बाद सीधे सरकारी नौकरियों की चयन प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगे। उनके डॉक्टर और इंजीनियर बनने का रास्ता कानूनी रूप से साफ हो गया है।
अल्पसंख्यक विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने नई कार्यप्रणाली का तकनीकी खाका पेश किया। नए प्राधिकरण के दायरे में अब केवल मुस्लिम शिक्षण संस्थान ही नहीं होंगे। राज्य में मौजूद ईसाई, बौद्ध, सिख और जैन समुदाय के शैक्षिक संस्थानों को भी इसी प्राधिकरण से सीधे तौर पर विशिष्ट मान्यता प्रदान की जाएगी।
पुष्कर सिंह धामी ने मदरसों में आधुनिक शिक्षा का जिक्र करते हुए कहा कि एआई, मशीन लर्निंग और डिजिटल तकनीक आज के वक्त की सबसे बड़ी व्यावसायिक मांग हैं। कोई भी बच्चा विकास की इस वैश्विक दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहिए। छात्र अपनी पुरानी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहेंगे और साथ ही विज्ञान, गणित और कंप्यूटर साइंस में दक्ष बनेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सिफारिशों को आधार बनाकर ही इस प्राधिकरण का मसौदा तैयार किया गया है। समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के बाद धामी सरकार का यह दूसरा ऐसा बड़ा फैसला है जो देश के अन्य राज्यों के लिए सीधा मॉडल बन रहा है।
पुरानी व्यवस्था में जिन अल्पसंख्यक वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल नहीं था, वे अब शिक्षा के क्षेत्र में सीधे बराबरी के हकदार होंगे। सरकार का स्पष्ट तर्क है कि इस नए प्राधिकरण की स्थापना किसी भी समुदाय की अपनी पहचान या धार्मिक परंपराओं को प्रभावित करने के लिए बिल्कुल नहीं की गई है। सभी वर्गों को समान और गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना ही इस फैसले का एकमात्र मूल आधार है।









