हरिद्वार, 2 जुलाई 2026 (दून हॉराइज़न)।
Madrasa Board News : उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड की व्यवस्था हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है। बीते 1 जुलाई 2026 से राज्य में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण पूरी तरह अस्तित्व में आ चुका है। हरिद्वार जिले में संचालित मदरसों को अब अनिवार्य रूप से निजी विद्यालयों की तर्ज पर इसी नए प्राधिकरण से मान्यता हासिल करनी होगी।
जिला प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी बेसिक अमित कुमार चंद की मेज पर अब तक 26 मदरसों की मान्यता के आवेदन पहुंच चुके हैं। विभाग के कर्मचारी इन दस्तावेजों की सघन जांच में जुटे हैं। हरिद्वार जिले में करीब ढाई सौ मदरसे चलते हैं। लगातार नए आवेदन और जरूरी कागजात शिक्षा विभाग के दफ्तर में जमा हो रहे हैं।
शिक्षा विभाग का मुख्य लक्ष्य सभी मदरसों को एक समान शिक्षा व्यवस्था के ढांचे में लाना और उन्हें नियमानुसार संचालित कराना है। मान्यता देने के लिए विभाग ने बेहद सख्त मानक तय किए हैं। भवन का ढांचा, आधारभूत सुविधाएं, पढ़ाने का तरीका और सुरक्षा मानकों की जमीनी रिपोर्ट बनने के बाद ही कोई फाइल आगे बढ़ेगी। आवेदन की कोई अंतिम तिथि अभी तक घोषित नहीं हुई है। शिक्षा अधिकारी चाहते हैं कि सभी मदरसे जल्द से जल्द अपनी फाइलें जमा कर दें जिससे भौतिक सत्यापन का काम समय रहते पूरा किया जा सके।
सरकार के सख्त निर्देशों पर शिक्षा विभाग की टीमों ने हाल ही में हरिद्वार जनपद के 131 मदरसों में चेकिंग अभियान चलाया था जहां दस्तावेजों और भौतिक स्थिति का सघन मुआयना किया गया। जांच रिपोर्ट में 23 मदरसों के अंदर बड़ी अनियमितताएं पकड़ी गईं। विभाग ने फौरन सख्त कार्रवाई करते हुए 11 मदरसों के पीएम पोषण योजना वाले मिड डे मील फंड पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था का स्तर सुधारने के लिए इस नए प्राधिकरण का खाका तैयार किया था जिसे अब धरातल पर उतारा गया है। उत्तराखंड राज्य में कुल 452 मदरसों को अब अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की परिधि में आना होगा। वर्तमान समय में 400 मदरसे पहली से आठवीं कक्षा तक की तालीम दे रहे हैं। नौवीं से 12वीं कक्षा तक चलने वाले मदरसों की कुल संख्या 52 दर्ज की गई है।
जनपद के 250 मदरसों में से पहले केवल 131 पुराने मदरसा बोर्ड के पास पंजीकृत थे। बाकी बचे हुए मदरसे स्वतंत्र रूप से चल रहे थे। बोर्ड भंग होने के बाद अब बिना पंजीकरण कोई भी मदरसा संचालित नहीं हो पाएगा। सभी के लिए नई मान्यता लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
दर्जनों मदरसों के सामने एक बड़ी चुनौती जमीन की मिल्कियत को लेकर खड़ी हो गई है। जिले में कई मदरसों के पास अपनी निजी जमीन का कोई वैध दस्तावेज नहीं है। वे पुरानी मदरसा बोर्ड संपत्ति पर ही कक्षाएं चला रहे हैं। शिक्षा विभाग के नए मानकों पर खरे न उतरने के कारण इन मदरसों की मान्यता की राह में भारी विधिक दिक्कतें आना तय है।









