देहरादून के 7 दिवसीय सरस फूड फेस्टिवल 2026 में स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने 1.01 करोड़ का रिकॉर्ड टर्नओवर दर्ज किया। जानिए पूरा जमीनी ब्योरा।
देहरादून (12 अक्टूबर) : देहरादून में आयोजित सात दिवसीय ‘सरस फूड फेस्टिवल 2026’ में स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की ग्रामीण महिलाओं ने महज एक हफ्ते के भीतर 1 करोड़ 1 लाख 692 रुपये का कारोबार कर नया कीर्तिमान बना दिया है। ग्राम्य विकास विभाग और जिला प्रशासन देहरादून के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुए इस आयोजन में उत्तराखंड के सभी 13 जिलों समेत देश के 17 राज्यों की महिला उद्यमियों ने 200 से अधिक स्टॉलों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों, जैविक उत्पादों और हस्तशिल्प की सीधी बिक्री ने यह साबित कर दिया कि बिचौलियों को हटाते ही ग्रामीण महिलाएं अब ‘लखपति दीदी’ से सीधे ‘करोड़पति दीदी’ बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी हैं।
सात दिन में एक करोड़ की सीधी बिक्री
फेस्टिवल की नोडल अधिकारी अनीता पंवार ने बताया कि सात दिनों के इस मेले में स्वयं सहायता समूहों ने कुल 1,01,00,692 रुपये का टर्नओवर हासिल किया है। आम तौर पर मेलों में होने वाली सामान्य बिक्री के मुकाबले यह आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला और उत्साहजनक है। दूनवासियों ने पहाड़ी कंडाली का साग, झंगोरे की खीर, मंडुवे की रोटी, गहत की दाल और पारंपरिक मसालों को हाथों-हाथ खरीदा। खान-पान के साथ-साथ विभिन्न राज्यों से आए हैंडलूम वस्त्रों और दस्तकारी उत्पादों के काउंटरों पर भी दिनभर खरीदारों की कतारें लगी रहीं।
बिचौलियों के बिना सीधे खरीदारों तक पहुंचे उत्पाद
इस मेले की सबसे बड़ी सफलता ग्रामीण कारीगरों और शहरी ग्राहकों के बीच की खाई को पाटना रही। अमूमन गांवों में बनने वाले जैविक उत्पाद स्थानीय स्तर पर बेहद कम दामों में बिकते थे, जिसका बड़ा मुनाफा आढ़ती या बिचौलिए ले जाते थे। सरस मेले के जरिए 17 राज्यों की महिलाओं को पहली बार अपनी तय कीमत पर सीधे उपभोक्ता को माल बेचने का अधिकार मिला। इसके साथ ही आयोजन स्थल पर स्थानीय कलाकारों की दैनिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने माहौल को उत्सव में बदला, जिससे फुटफॉल में भारी इजाफा हुआ।
लखपति से करोड़पति दीदी बनाने की सरकारी तैयारी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ग्रामीण आजीविका संवर्धन योजना के तहत इस तरह के मेलों को अब केवल मौसमी आयोजन न रखकर स्थायी बाजार का रूप देने की तैयारी है। नोडल अधिकारी के मुताबिक, सरकार का विजन महिला समूहों को सिर्फ लखपति के आंकड़े तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उन्हें बड़े कॉरपोरेट ब्रांड्स के बराबर खड़ा करना है। ग्राम्य विकास विभाग अब इन महिला समूहों के चुनिंदा पहाड़ी उत्पादों को बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है ताकि गांव लौटकर भी उनकी यह कमाई निरंतर जारी रहे।









