अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी एंगल पर नया मोड़ आया है। पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ ने सीबीआई कोर्ट में नार्को टेस्ट के लिए लिखित सहमति दे दी है।
देहरादून (23 अक्टूबर) : उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी की पहचान को लेकर जारी सियासी और कानूनी घमासान में आज बड़ा मोड़ आ गया। मामले में घिरे पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ ने देहरादून स्थित सीबीआई की विशेष अदालत में पेश होकर अपने नार्को टेस्ट के लिए औपचारिक सहमति दे दी है।
वहीं दूसरी ओर, इस पूरे विवाद में कथित दावों और वायरल ऑडियो को लेकर चर्चा में आईं उर्मिला सनावर भी कोर्ट के नोटिस पर पेश हुईं। अदालत परिसर में दोनों पक्षों की मौजूदगी से दिनभर गहमागहमी बनी रही, जिसके बाद अब मामले की जांच साइंटिफिक साक्ष्यों की दिशा में बढ़ती दिख रही है।
पूर्व विधायक ने दिखाई नार्को टेस्ट की कानूनी सहमति
सीबीआई कोर्ट पहुंचे पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ ने मीडियाकर्मियों के सामने नार्को टेस्ट की लिखित सहमति से जुड़ा दस्तावेज सार्वजनिक किया। उन्होंने साफ किया कि वह जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग देने के लिए तैयार हैं और उन्होंने किसी व्यक्ति विशेष पर सीधे आरोप नहीं लगाए हैं। हालांकि, हालिया दिनों में सोशल मीडिया पर सामने आए कथित ऑडियो टेप से जुड़े तीखे सवालों पर उन्होंने कोई सीधा रुख साफ नहीं किया।
राजनीतिक हलकों में राठौड़ के इस कदम को खुद पर लगे आरोपों की धार कुंद करने और खुद को बेदाग साबित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। उनके कोर्ट से रवाना होने के तुरंत बाद इस मामले की मुख्य सूत्रधार मानी जा रही उर्मिला सनावर अदालत पहुंचीं।
वायरल ऑडियो और कथित वीआईपी का उलझा सियासी पेच
अंकिता भंडारी हत्याकांड की शुरुआत से ही रिजॉर्ट में आने वाले कथित वीआईपी के नाम को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। हाल ही में उर्मिला सनावर और पूर्व विधायक के बीच कथित बातचीत का ऑडियो सामने आने के बाद यह विवाद दोबारा प्रदेश की सियासत के केंद्र में आ गया था। अदालत परिसर में पहुंची उर्मिला सनावर ने मीडिया से बातचीत में स्थानीय पुलिस प्रशासन पर असहयोग का आरोप जड़ा।
उन्होंने दावा किया कि उन्हें निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक माहौल नहीं मिल पा रहा है, जिसके चलते उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिलकर पूरी बात रखने का समय मांगा है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, जब दोनों पक्षों के परस्पर विरोधाभासी दावे सामने आ रहे हों, तब नार्को जैसे साइंटिफिक परीक्षण विरोधाभास सुलझाने का अहम जरिया बनते हैं।
अदालत तय करेगी नार्को प्रक्रिया और आगे की रूपरेखा
सीबीआई कोर्ट की निगरानी में अब दोनों के नार्को और पॉलीग्राफ से जुड़ी विधिक औपचारिकताओं को अंतिम रूप दिया जाना है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस (सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य) के तहत किसी भी व्यक्ति का नार्को टेस्ट उसकी स्वतंत्र सहमति के बिना नहीं कराया जा सकता, इसलिए राठौड़ की सहमति जांच के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।
जांच एजेंसी अब कोर्ट के जरिए फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) से समय लेकर मेडिकल फिटनेस और सवालों की फेहरिस्त तैयार करेगी। इस साइंटिफिक जांच के जरिए वायरल ऑडियो की सच्चाई, पर्दे के पीछे छिपे तथ्यों और कथित वीआईपी से जुड़े दावों की हकीकत सामने आने की उम्मीद बंधी है।









