टिहरी के कुंजापुरी मेले में दलेर मेहंदी के लचर शो और लिप-सिंक पर मंत्री सुबोध उनियाल के कड़े रुख को जनता का भारी समर्थन मिला। ₹35 लाख की जवाबदेही पर छिड़ी बहस।
देहरादून (25 अक्टूबर) : टिहरी के प्रसिद्ध ‘सिद्धपीठ माँ कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले’ की सांस्कृतिक संध्या में मशहूर गायक दलेर मेहंदी के लचर प्रदर्शन को लेकर उपजे विवाद में अब नया मोड़ आ गया है। इस पूरे घटनाक्रम में उत्तराखंड सरकार के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल को देवभूमि की जनता, स्थानीय सामाजिक संगठनों और युवाओं का व्यापक समर्थन मिल रहा है। जनता का मानना है कि बड़े नामों के आगे नतमस्तक होने के बजाय जनता के खून-पसीने की कमाई और मंच की मर्यादा के लिए निर्भीक होकर आवाज उठाना एक सच्चे और जिम्मेदार जनप्रतिनिधि की पहचान है।
क्या था पूरा घटनाक्रम?
नई टिहरी में आयोजित माँ कुंजापुरी मेले की सांस्कृतिक संध्या के दौरान पंजाबी गायक दलेर मेहंदी को मुख्य प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्हें ₹35 लाख की भारी-भरकम राशि का अग्रिम भुगतान किया गया था। लेकिन जब वे मंच पर आए, तो न केवल वे असहज दिखे, बल्कि लाइव गायकी के बजाय केवल गानों पर ‘लिप-सिंक’ (Lip-syncing) करते नजर आए।
स्थानीय जनता और दूर-दराज से आए दर्शकों की भारी भीड़ अपने चहेते कलाकार की इस लापरवाही से ठगी सी महसूस कर रही थी। इसी बीच कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने मंच पर पहुंचकर सीधे सवाल उठाया कि देवभूमि की पावन धरती और माँ दुर्गा के धार्मिक आयोजन में इतना बड़ा मानदेय लेने के बाद ऐसी गैर-जिम्मेदाराना प्रस्तुति क्यों दी जा रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई बड़ा कलाकार अपनी कला और जनता के प्रति न्याय नहीं कर सकता, तो यह दर्शकों को धोखा देने जैसा है।
जनता क्यों दे रही है सुबोध उनियाल का साथ?
विवाद के बाद सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर स्थानीय जनता खुलकर सुबोध उनियाल के पक्ष में आ गई है।
- जनता के पैसे की जवाबदेही: स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ₹35 लाख कोई छोटी रकम नहीं होती। यह जनता और मेले के बजट का धन है। यदि किसी कलाकार को इतना बड़ा भुगतान किया गया है, तो जनता को पूरा और खरा मनोरंजन मिलना चाहिए। मंत्री जी ने वीआईपी संस्कृति से ऊपर उठकर जनता के अधिकार की बात की।
- धार्मिक मंच की गरिमा की रक्षा: नवरात्रि और माँ कुंजापुरी के पावन पर्व पर आयोजित इस कार्यक्रम की एक आध्यात्मिक गरिमा थी। लोगों का कहना है कि मंच पर आकर असहज और लड़खड़ाती स्थिति में दिखना देवभूमि की आस्था के अनुरूप नहीं था। मंत्री ने इस मर्यादा की रक्षा की।
- पेशेवर ईमानदारी का तकाजा: सुबोध उनियाल ने बाद में भी साफ किया कि यदि कलाकार की तबीयत ठीक नहीं थी, तो उन्हें पहले आयोजकों को सूचित करना चाहिए था। मंत्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जब गायिका सुनंदा शर्मा की तबीयत बिगड़ी थी, तो उन्होंने अग्रिम राशि लौटाकर कार्यक्रम रद्द करने की सूचना दी थी, जो कि पेशेवर नैतिकता का उदाहरण है। जब दलेर मेहंदी के भाई मीका सिंह व बॉलीवुड की कुछ हस्तियों ने दलील दी कि उनकी तबीयत खराब थी, तो जनता का भी यही सवाल है कि बीमार होने के बावजूद पूरा भुगतान लेकर मंच पर जाना और फिर लिप-सिंक करना कहां तक उचित है?
स्थानीय लोगों और प्रबुद्ध वर्ग की प्रतिक्रिया
टिहरी और गढ़वाल क्षेत्र के युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा:
“अक्सर देखा जाता है कि बड़े कलाकार छोटे शहरों या पहाड़ी क्षेत्रों के सरकारी मेलों में आकर औपचारिकता निभाते हैं और मोटी रकम लेकर चले जाते हैं। मंत्री सुबोध उनियाल ने पहली बार मंच पर खड़े होकर यह संदेश दिया है कि उत्तराखंड की भोली-भाली जनता को कोई हल्के में न ले। उन्होंने जनता की भावना को मुखर किया है।”
सोशल मीडिया पर भी सुबोध उनियाल के इस साहसिक कदम की जमकर तारीफ हो रही है। लोगों का कहना है कि भले ही मुंबई के कुछ सेलिब्रिटीज अपने साथी कलाकार के बचाव में खड़े हों, लेकिन धरातल पर सुबोध उनियाल ने जो स्टैंड लिया, वह आम जनता के हितों की रक्षा करने वाला है।

कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने भी साफ कर दिया है कि वे अपनी बात पर पूरी तरह अडिग हैं। उनका मकसद किसी व्यक्ति विशेष का अपमान करना नहीं, बल्कि जनता के सम्मान, सरकारी धन की जवाबदेही और कला के प्रति समर्पण को बनाए रखना था। उत्तराखंड की जनता के इस व्यापक समर्थन से यह साबित हो गया है कि देवभूमि में नाम और रसूख से बड़ा जनता का आत्मसम्मान और पारदर्शिता है।









