दून हॉराइज़न, देहरादून (9 सितंबर): 15 साल लंबी और थकाऊ कानूनी लड़ाई के बाद अंततः पतंजलि योगपीठ के प्रमुख चेहरों में से एक आचार्य बालकृष्ण (Acharya Balkrishna) के माथे से फर्जीवाड़े का दाग धुल गया है।
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देहरादून स्थित विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीबीआई) संदीप सिंह भंडारी की अदालत ने उन्हें फर्जी पासपोर्ट व शैक्षणिक प्रमाणपत्र मामले में बाइज्जत बरी कर दिया है। उनके साथ ही इस केस में सह-आरोपी बनाए गए नरेश चंद्र द्विवेदी को भी अदालत ने दोषमुक्त करार दिया है।
राष्ट्रपति भवन से शुरू हुआ था विवाद
यह पूरा हाई-प्रोफाइल मामला साल 2011 का है। उस वक्त अखिल भारतीय संत समिति के तत्कालीन अध्यक्ष ने सीधे राष्ट्रपति को एक शिकायती पत्र भेजा था। पत्र में बेहद गंभीर दावे किए गए थे कि बालकृष्ण मूल रूप से नेपाल के नागरिक हैं। आरोप था कि उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी की फर्जी डिग्रियों (पूर्व मध्यमा और शास्त्री) का सहारा लेकर बरेली पासपोर्ट कार्यालय से अपना भारतीय पासपोर्ट बनवाया। इसी शिकायत का संज्ञान लेते हुए 2011 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने मुकदमा दर्ज कर अपनी तफ्तीश शुरू कर दी थी।
कोर्ट में नहीं टिक पाई सीबीआई की थ्योरी
जांच एजेंसी ने साल 2012 में इस मामले में कड़ा एक्शन लेते हुए बालकृष्ण को गिरफ्तार भी किया था, जिसके चलते उन्हें लगभग एक महीना जेल की सलाखों के पीछे गुजारना पड़ा था। लेकिन, अदालत के भीतर ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष इन आरोपों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। सीबीआई ऐसे कोई ठोस सुबूत पेश नहीं कर पाई जो यह सिद्ध कर सकें कि डिग्रियां वाकई जाली थीं या उन्हें हासिल करने में किसी आपराधिक साजिश को अंजाम दिया गया था। वहीं, सह-आरोपी नरेश द्विवेदी पर जाली दस्तावेज मुहैया कराने का जो चार्ज था, वो भी अदालत में निराधार साबित हुआ।
फैसले के बाद छलका बालकृष्ण का दर्द
अदालत से क्लीन चिट मिलने के तुरंत बाद आचार्य बालकृष्ण ने राहत की सांस ली। हालांकि, अपनी प्रतिक्रिया में उनका दर्द भी साफ नजर आया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि उन्हें देश की न्यायपालिका पर हमेशा से अटूट भरोसा था। लंबी न्यायिक प्रक्रिया को बेहद थकाने वाला बताते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्हें भारी अपमान, अपयश और नकारात्मक ऊर्जा का सामना करना पड़ा। अंततः सत्य की ही जीत हुई है।
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