देहरादून में ब्रिटिश काल की जर्जर इमारतों और 200 हेरिटेज साइटों के संरक्षण के लिए जिला प्रशासन ने बड़ी तैयारी शुरू कर दी है। डीएम के निर्देश पर विशेष डीपीआर और कार्यशाला का आयोजन होगा।
देहरादून (04 अक्टूबर 2026) : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ब्रिटिश काल से खड़ी कई ऐतिहासिक इमारतें वक्त की मार और रखरखाव के अभाव में जर्जर होती जा रही हैं। इन तमाम ऐतिहासिक धरोहरों को संवारने और उनकी सुरक्षा पुख्ता करने के वास्ते अब जिला प्रशासन ने कमर कस ली है। शुरुआती सर्वे के दौरान शहर के भीतर करीब 200 हेरिटेज साइटों की पहचान की गई है, जिनमें कई पुरानी वास्तुकला के बेजोड़ नमूने शामिल हैं।
जर्जर होती विरासत
देहरादून शहर के विभिन्न हिस्सों में ब्रिटिश वास्तुकला की अमिट निशानियां मौजूद हैं। इनमें ऐसले हॉल, क्लॉक टावर, जामा मस्जिद, सीएनआई बॉयज इंटर कॉलेज और गुरु राम राय दरबार जैसे महत्वपूर्ण भवन अपनी कहानी खुद बयां करते हैं। हालांकि, इनमें से कई इमारतें व्यावसायिक दबाव और समय पर मरम्मत न होने के कारण खस्ताहाल हो चुकी हैं। बीते सितंबर महीने में चकराता रोड स्थित एलआईसी बिल्डिंग का एक हिस्सा अचानक भरभराकर गिर गया था, जिससे नीचे खड़ी कार और स्कूटी क्षतिग्रस्त हो गईं।
यह अलग बात है कि नगर निगम ने इस इमारत को साल 2013 में ही गिरासू घोषित कर दिया था, लेकिन मालिक और किरायेदारों के बीच कानूनी दांव-पेंच के कारण कार्रवाई नहीं हो सकी थी। नगर निगम की ताजा रिपोर्ट में शहर भर के 21 अति-संवेदनशील और खतरनाक भवनों को चिन्हित किया गया है, जिनमें से कई जगहों पर अब भी लोग जान जोखिम में डालकर रह रहे हैं।
हिस्टोरिक सिटी सीरीज और नई कार्ययोजना
बढ़ते खतरों को देखते हुए देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने हाल ही में हुई उच्चस्तरीय बैठक में सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। हिस्टोरिक सिटी सीरीज- 2026 पहल के तहत एनजीओ और हेरिटेज संगठनों को शहर की पुरानी विरासतों का विस्तृत दस्तावेजीकरण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा, अक्टूबर 2026 में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन प्रस्तावित है, जिसमें तमाम विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों से बहुमूल्य सुझाव लिए जाएंगे।
इन महत्वपूर्ण हेरिटेज साइटों को भविष्य की टाउन प्लानिंग प्रक्रिया का मुख्य हिस्सा बनाया जाएगा, ताकि शहर के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना उसे सुरक्षित रखा जा सके। जिला पर्यटन विकास अधिकारी को भी इन सभी चिन्हित स्थलों के संरक्षण के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने के निर्देश जारी किए जा चुके हैं, जिसे बाद में अंतिम अनुमोदन के लिए राज्य सरकार के पास भेजा जाएगा।
तकनीकी जांच
प्रशासन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी भवन को गिरासू या असुरक्षित घोषित करने से पहले उसकी गहरी तकनीकी और संरचनात्मक जांच अनिवार्य होगी। चकराता रोड स्थित एलआईसी बिल्डिंग, जिसे कनॉट प्लेस के नाम से भी जाना जाता है और जिसका निर्माण कार्य 1947 में पूरा हुआ था, जैसे मामलों से सबक लेते हुए स्थानीय प्रशासन अब बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। सभी उप जिलाधिकारियों और स्थानीय निकायों को अपने-अपने क्षेत्रों में संभावित रूप से खतरनाक इमारतों का प्राथमिकता के आधार पर सर्वे पूरा करने को कहा गया है, ताकि किसी भी बड़े हादसे को समय रहते टाला जा सके।









