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दिल्ली के जंतर-मंतर के बाद अब उत्तराखंड में होगा सीजेपी का आंदोलन, धामी सरकार को दिया 10 दिन का समय

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दून हॉराइज़न, देहरादून (21 सितंबर) : उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में चरमराती बुनियादी शिक्षा और लगातार वीरान होते प्राथमिक विद्यालयों को लेकर अब सियासी हलचल तेज हो गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अब उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की घोषणा की है।

संगठन ने राज्य सरकार को स्पष्ट अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि 10 दिनों के भीतर ताले लटके प्राथमिक विद्यालयों को पुनर्जीवित करने के लिए कोई स्पष्ट कार्ययोजना नहीं लाई गई, तो 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के बाद प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा।

5 साल में 826 स्कूलों पर ताले, विधानसभा के आंकड़ों से घेरा

देहरादून स्थित प्रेस क्लब में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सीजेपी के नॉर्थ जोन कोऑर्डिनेटर श्रेष्ठ सिंह खेड़ा ने राज्य की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए। खेड़ा ने सदन के पटल पर रखे गए आधिकारिक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि राज्य के शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत (Education Minister) द्वारा विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में राज्यभर के 826 प्राथमिक स्कूल पूरी तरह बंद हो चुके हैं।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शून्य छात्रसंख्या और शिक्षकों की भारी कमी का बहाना बनाकर जिस तरह स्कूलों को मर्ज या बंद किया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है। इससे न केवल ग्रामीण बच्चों के बुनियादी शिक्षा के अधिकार पर चोट पड़ रही है, बल्कि सुदूर क्षेत्रों में निजी शिक्षण संस्थानों की मनमानी को खुली छूट मिल रही है।

2 अक्टूबर की डेडलाइन और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की चेतावनी

सीजेपी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके के नेतृत्व में पार्टी इससे पूर्व महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जर्जर सरकारी स्कूलों के खिलाफ मुहिम चला चुकी है। संगठन के पदाधिकारियों का आरोप है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रख रहे युवाओं पर पुलिसिया बल प्रयोग किया गया, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

खेड़ा ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि तय समयसीमा में सरकार ने बंद पड़े इन 826 स्कूलों को दोबारा संचालित करने और शिक्षकों की स्थाई तैनाती को लेकर कोई ठोस ढांचा सार्वजनिक नहीं किया, तो वे सीधे विभागीय मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतरेंगे।

‘घोस्ट विलेज’ और पहाड़ों से निरंतर होता पलायन

संवाददाता सम्मेलन के दौरान संगठन ने शिक्षा की बदहाली को सीधे तौर पर पहाड़ से हो रहे पलायन से जोड़ा। हाल ही में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर देशभर में दीये जलाए जाने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए खेड़ा ने तीखा तंज कसा। उनका कहना था कि यदि असल में दीये जलाने ही थे, तो वे राज्य के उन सैकड़ों खाली पड़े ‘भूतिया गांवों’ (Ghost Villages) में जलाए जाने चाहिए थे, जो रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में वीरान हो चुके हैं।

दरअसल, जब गांव में प्राथमिक पाठशाला ही नहीं बचेगी, तो परिवार अपने बच्चों के भविष्य के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर रुख करने को मजबूर होंगे। यही वजह है कि संगठन ने स्पष्ट किया है कि यह लड़ाई केवल बंद इमारतों को खोलने की नहीं, बल्कि पहाड़ की रीढ़ को बचाने की है।

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