देहरादून, 19 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के मोरोवाला और सुभाषनगर इलाकों में कब्रिस्तानों की जमीन (Dehradun Kabristan Dispute) को लेकर स्थानीय और प्रवासियों के बीच तकरार शुरू हो गई है। दशकों से इन इलाकों में रह रहे उन परिवारों को अब ‘बाहरी’ बताकर शव दफनाने से मना किया जा रहा है, जो मूल रूप से टिहरी, पौड़ी या उत्तर प्रदेश के बिजनौर और सहारनपुर जैसे जिलों से आए हैं। यह गंभीर मामला अब पुलिस, प्रशासन और वक्फ बोर्ड की चौखट तक पहुंच गया है।
विवाद की शुरुआत हाल ही में हुई जब टर्नर रोड निवासी अकबर हुसैन के इंतकाल के बाद उन्हें सुभाषनगर कब्रिस्तान में दफनाने से रोक दिया गया। परिजनों के विरोध के बावजूद सहमति न बनने पर अंततः शव को चंदरनगर ले जाकर सुपुर्द-ए-खाक करना पड़ा। इसी तरह की शिकायतें मोरोवाला से भी आ रही हैं, जहां स्थानीय कमेटियों ने जगह की कमी का हवाला देकर नए शवों के लिए गड्ढा खोदने से हाथ खड़े कर दिए हैं।
कमेटी का तर्क: जगह नहीं, तो कहां दफनाएं?
मोरोवाला कब्रिस्तान कमेटी के सदर आबिद अली के अनुसार, यह जमीन अंग्रेजों के समय से गांव के लिए आवंटित थी। तब आबादी सीमित थी, लेकिन अब जनसंख्या कई गुना बढ़ चुकी है। स्थिति यह है कि एक ही जगह पर तीन-तीन बार कब्र खोदने के बाद भी जगह मिलना मुश्किल हो रहा है। वहीं, सुभाषनगर कमेटी का कहना है कि कब्रिस्तान पूरी तरह भर चुका है और फिलहाल वहां भराव (लैंडफिल) का काम चल रहा है, ताकि जमीन को फिर से उपयोग के लायक बनाया जा सके।
वक्फ बोर्ड का सख्त रुख और वैकल्पिक समाधान
इस मामले पर उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कब्रिस्तान किसी निजी व्यक्ति या कमेटी की जागीर नहीं है और किसी भी मुस्लिम को दफनाने से मना करना नियम विरुद्ध है। उन्होंने कुछ लोगों पर इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप भी लगाया।
प्रशासनिक स्तर पर समाधान देते हुए शम्स ने बताया कि हरिद्वार बाईपास पर कबाड़ी पुल के पीछे करीब 16 बीघा जमीन कब्रिस्तान के लिए पहले से आवंटित है। पूर्व मेयर विनोद चमोली के प्रयासों से मिली इस जमीन का उपयोग करने के लिए एक महीने पहले ही कमेटी गठित की जा चुकी है। वक्फ बोर्ड ने लोगों से अपील की है कि वे भीड़भाड़ वाले इलाकों के बजाय इस नए और बड़े कब्रिस्तान का उपयोग करें।









