Haridwar Land Scam : हरिद्वार नगर निगम के बहुचर्चित गार्बेज डंपिंग यार्ड घोटाले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सीधे बर्खास्तगी का हंटर चलाया है। तत्कालीन नगर आयुक्त और आईएएस अधिकारी वरुण चौधरी की सेवाएं समाप्त करने की फाइल केंद्र को भेज दी गई है।
शुक्रवार को शासन स्तर से इस पर अंतिम मुहर लगी। मामले में फंसे तत्कालीन डीएम कमेंद्र सिंह के खिलाफ ‘मेजर पनिशमेंट’ यानी दीर्घ शास्ति की संस्तुति की गई है। कमेंद्र सिंह का डिमोशन किया जाएगा या फिर उन्हें सीधे नौकरी से बाहर किया जाएगा।
हरिद्वार के तत्कालीन एसडीएम अजयवीर सिंह को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। उनके खिलाफ परनिंदा प्रविष्टि दर्ज कर दी गई है। अजयवीर की तीन वेतन वृद्धियां तत्काल प्रभाव से रोक दी गई हैं।
दोनों वरिष्ठ अधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा के हैं। विधिक कार्रवाई के लिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को शासन ने लिखित रिपोर्ट भेज दी है।
हरिद्वार में कूड़ा निस्तारण के लिए 2.3070 हेक्टेयर जमीन खरीदी जानी थी। इस जमीन की वास्तविक कीमत महज 15 करोड़ रुपये थी। अफसरों ने सिंडिकेट बनाकर इसे 54 करोड़ रुपये में खरीदा।
सरकारी खजाने को सीधे 39 करोड़ रुपये का चूना लगाया गया। सराय भूमि घोटाले में सबसे बड़ा खेल कृषि भूमि को रातों-रात कमर्शियल करने में हुआ।
धारा 143 के तहत भूमि उपयोग परिवर्तन में आम आदमी के महीनों चक्कर कटवाए जाते हैं। इस मामले में सिर्फ सात दिन के भीतर कृषि भूमि व्यावसायिक श्रेणी में तब्दील हो गई। रिकॉर्ड समय में फाइलें दौड़ाई गईं।
पिछले साल 3 जून 2025 को मुख्यमंत्री धामी ने पहली सर्जिकल स्ट्राइक की थी। तब तत्कालीन डीएम, नगर आयुक्त और एसडीएम समेत सात लोगों को एक झटके में सस्पेंड किया गया था। जांच रिपोर्ट में आरोप सौ फीसदी सही पाए गए।
कार्रवाई की इस जद में अधिकारियों की एक लंबी फौज शामिल है। तत्कालीन प्रशासक नगर निगम कर्मेन्द्र सिंह, नगर आयुक्त वरुण चौधरी और एसडीएम अजयवीर सिंह इस पूरी खरीद-फरोख्त के मुख्य किरदार रहे।
वरिष्ठ वित्त अधिकारी निकिता बिष्ट और वरिष्ठ वैयक्तिक सहायक विक्की पर भी गाज गिरी है। रजिस्ट्रार कानूनगो राजेश कुमार और मुख्य प्रशासनिक अधिकारी कमलदास भी जांच में दोषी मिले हैं।
प्रभारी सहायक नगर आयुक्त रविंद्र दयाल और संपत्ति लिपिक वेदपाल का सेवा विस्तार सीधे खत्म कर दिया गया है। निलंबित चल रहे प्रभारी अधिशासी अभियंता आनंद मिश्रवाण, कर एवं राजस्व अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट और अवर अभियंता डीसी कांडपाल भी इसी सिंडिकेट का हिस्सा थे।
उत्तराखंड के प्रशासनिक इतिहास में सराय भूमि घोटाला सबसे बड़े दाग के रूप में दर्ज हो चुका है। फाइलों में हुए खेल की पूरी परतें अब खुल चुकी हैं। जल्द केंद्र से अंतिम फैसला आएगा।









