देहरादून, 25 जून 2026 (दून हॉराइज़न)।
Indira Amma Canteens : देहरादून के विकास भवन कार्यालय ने इंदिरा अम्मा कैंटीन की थाली के दाम बढ़ाने का एक विस्तृत प्रस्ताव शासन को मंजूरी के लिए भेज दिया है। इस नए सरकारी प्रस्ताव के मुताबिक जो थाली अभी तक लोगों को बेहद कम कीमत पर परोसी जा रही थी, उसका रेट सीधे 50 रुपये तय करने की तैयारी है।
अधिकारी इस समय आम जनता की जेब पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को कम करने के लिए सब्सिडी की राशि में बढ़ोतरी करने के विकल्प पर भी गंभीरता से माथापच्ची कर रहे हैं। सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि अंतिम निर्णय होने तक आम लोगों को पुरानी दरों पर ही भोजन मिलता रहेगा।
स्वयं सहायता समूहों का बढ़ता घाटा और बंद होती रसोई
गैस सिलेंडर, हरी सब्जियों और राशन के लगातार आसमान छूते दामों ने रसोई का पूरा बजट बिगाड़ दिया है। भोजन तैयार करने वाले स्थानीय स्वयं सहायता समूहों के सामने अब पुराने रेट पर काम करना पूरी तरह घाटे का सौदा बन चुका था। महिलाओं ने कैंटीन चलाना असंभव बताते हुए जिला प्रशासन से कई बार दरें संशोधित करने की गुहार लगाई थी।
उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों में इस योजना की जमीनी हकीकत और थाली की कीमतें बेहद चौंकाने वाली हैं। उधमसिंहनगर के रुद्रपुर में संचालित हो रही तीन कैंटीनों में इस समय एक थाली की कीमत 80 रुपये तक वसूली जा रही है। वहीं दूसरी तरफ पौड़ी मुख्यालय में चल रही दो कैंटीनों के भीतर लोग 50 रुपये प्रति थाली की दर से भोजन खरीदने को मजबूर हैं।
बजट संकट से दम तोड़ती महत्वकांक्षी योजना
वर्ष 2015 में जब इस पूरी योजना की रूपरेखा तैयार की गई थी, तब सरकार ने पूरे राज्य के भीतर कुल 100 सस्ते भोजनालय स्थापित करने का एक बड़ा लक्ष्य तय किया था। प्रशासनिक ढर्रे और वित्तीय संकट के चलते पूरे प्रदेश में सिर्फ 42 भोजनालय ही धरातल पर शुरू हो सके थे। सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि इनमें से 19 कैंटीनों पर हमेशा के लिए ताला लटक चुका है।
देहरादून जिले के भीतर ही कुल 10 स्वीकृत कैंटीनों में से 5 पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं। हरिद्वार जिले के भीतर खुली दो कैंटीनों में से एक बंद पड़ी है और चालू कैंटीन में अभी 20 रुपये ही लिए जा रहे हैं।
कुमाऊं मंडल के जिलों में इस जनकल्याणकारी योजना का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। अल्मोड़ा के द्वाराहाट में साल 2016 से चल रही रसोई अब पूरी तरह बंद हो चुकी है। चम्पावत में साल 2015 के दौरान एकमात्र भोजनालय खोला गया था, जिसने महज तीन साल के भीतर दम तोड़ दिया। पिथौरागढ़ में साल 2018 से चूल्हा पूरी तरह ठंडा पड़ा है और नैनीताल की कैंटीन भी चार साल पहले बंद हो चुकी है।
शुरुआती दौर में योजना का मुख्य फोकस सूबे के गरीब तबके को बेहद सस्ता पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्थानीय महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना था। वर्तमान व्यवस्था के तहत कैंटीन में भोजन की मूल कीमत 30 रुपये निर्धारित की गई थी। इस कुल लागत में से सरकार प्रति थाली 10 रुपये की वित्तीय सब्सिडी खुद वहन करती आ रही है, जिससे आम आदमी को भोजन मात्र 20 रुपये में मिल जाता था।









