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NHM Uttarakhand Scheme : उत्तराखंड के बर्थ वेटिंग होम में रुकने वाले तीमारदार को मिलेंगे रोजाना 300 रुपये, एनएचएम ने शुरू की नई पहल

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देहरादून, 2 अगस्त, 2026 (दून हॉराइज़न)।

NHM Uttarakhand Scheme : उत्तराखंड में सुरक्षित प्रसव और संस्थागत डिलीवरी का आंकड़ा बढ़ाने के इरादे से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने एक अहम प्रशासनिक योजना लागू की है। राज्यभर में बने बर्थ वेटिंग होम (जन्म प्रतीक्षा गृह) में आने वाली गर्भवती महिलाओं के साथ ठहरने वाले तीमारदार को अब स्वास्थ्य विभाग 300 रुपये का डेली वेज (दैनिक भत्ता) प्रदान करेगा।

उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों में इस समय कुल 52 बर्थ वेटिंग होम संचालित किए जा रहे हैं। प्रत्येक बर्थ वेटिंग होम में एक बार में तीन गर्भवती महिलाओं के रहने और भोजन का पूरा इंतजाम रहता है। प्रसव की तय तारीख से कुछ दिन पहले ही महिलाओं को यहां लाकर रखा जाता है ताकि ऐन वक्त पर अस्पताल पहुंचने में कोई दिक्कत न आए।

पहाड़ी और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में मानसून के मौसम में भारी बारिश के कारण चट्टानें गिरने और भूस्खलन की घटनाएं लगातार होती हैं। कई बार मुख्य सड़कें और पैदल संपर्क मार्ग हफ्तों बंद रहते हैं। ऐसी स्थिति में गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाना बेहद जोखिम भरा हो जाता है।

आपदा और दुर्गम भूगोल की इन बाधाओं को दूर करने के लिए ही सरकार ने इन बर्थ वेटिंग होम का निर्माण कराया था। बीते साल के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पूरे राज्य में केवल 299 गर्भवती महिलाओं ने ही इस सुविधा का इस्तेमाल किया। भवनों और सुविधाओं की मौजूदगी के बावजूद यह संख्या बेहद कम दर्ज की गई।

स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठकों में यह बात सामने आई कि ग्रामीण इलाकों से महिलाओं के बर्थ वेटिंग होम न आने के पीछे आर्थिक और व्यावहारिक कारण हैं। घर का पुरुष या अन्य सदस्य जब महिला के साथ केंद्र में आकर रुकता है, तो उसकी रोज़ाना की कमाई बंद हो जाती है। इसी नुकसान की भरपाई करने के उद्देश्य से 300 रुपये रोजाना का भत्ता तय किया गया है।

एनएचएम के मिशन निदेशक डॉ. संदीप तिवारी ने बताया कि दूरदराज के पर्वतीय इलाकों और बिना सड़क वाले गांवों की गर्भवती महिलाओं के लिए यह व्यवस्था बेहद कारगर है। डिलीवरी की संभावित तारीख से पहले महिलाएं यहां आकर आराम से रुक सकती हैं। इस बार तीमारदारों के ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था के साथ-साथ उनके लिए रोजाना दिहाड़ी देने का नियम जोड़ा गया है।

प्रशासनिक समीक्षा में एक और व्यावहारिक अड़चन सामने आई है। गांव में रहने वाले परिवारों के पास मवेशी और खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी होती है। गर्भवती महिला और एक तीमारदार के घर से दूर चले जाने पर पीछे पशुओं की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचता।

गांवों में काम कर रही आशा कार्यकर्ताओं को इस योजना के प्रचार-प्रसार की मुख्य जिम्मेदारी सौंपी गई है। आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर महिलाओं को बर्थ वेटिंग होम के फायदे समझा रही हैं। पूरे साल भर चालू रहने वाले इन केंद्रों में मानसून के दौरान खास तौर पर गर्भवती महिलाओं को शिफ्ट करने की प्राथमिकता रखी गई है।

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