उत्तराखंड में गन्ना किसानों के मसले पर निर्दलीय विधायक उमेश शर्मा के आरोपों पर कांग्रेस ने तीखा पलटवार कर 10 साल की भाजपा सरकार से हिसाब मांगने को कहा।
देहरादून (27 अक्टूबर) : उत्तराखंड की तराई और मैदानी बेल्ट में गन्ने की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। खानपुर से निर्दलीय विधायक उमेश शर्मा द्वारा कांग्रेस पर गन्ना किसानों की अनदेखी का आरोप लगाने के बाद प्रदेश कांग्रेस ने बेहद आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष राजीव महर्षि ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए विधायक पर सत्ताधारी दल (भाजपा) के इशारों पर काम करने का खुला आरोप लगाया है। कांग्रेस ने साफ कहा कि सवाल विपक्ष से नहीं, बल्कि पिछले एक दशक से सत्ता पर काबिज सरकार से पूछे जाने चाहिए।
निर्दलीय विधायक के आरोपों पर कांग्रेस का तीखा पलटवार
प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष राजीव महर्षि ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि खानपुर विधायक उमेश शर्मा की बयानबाजी उनकी राजनीतिक मंशा को उजागर करती है। महर्षि के अनुसार, अगर किसी राजनीतिक दल ने वास्तव में किसानों की बुनियादी समस्याओं को दूर करने की ठोस पहल की, तो वह सिर्फ कांग्रेस रही है।
केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने देश भर के अन्नदाताओं का ₹71,680 करोड़ का ऐतिहासिक कृषि कर्ज माफ किया था। महर्षि ने सीधे तौर पर विधायक को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे सत्ताधारी दल से यह पूछने का साहस जुटाएं कि डबल इंजन की सरकार ने अपने 10 साल के शासनकाल में गन्ना उत्पादकों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए क्या कदम उठाए।
तिवारी और रावत सरकारों के गन्ना सुधारों का ब्योरा
कांग्रेस उपाध्यक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्यों का हवाला देते हुए बताया कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद नारायण दत्त तिवारी के पहले कार्यकाल (2002-2007) में गन्ने का राज्य परामर्शित मूल्य (एसएपी) तय करने की पारदर्शी व्यवस्था लागू की गई थी। इसके साथ ही बाजपुर, किच्छा और नादेही सहकारी चीनी मिलों को आर्थिक संबल देकर चालू रखा गया और गन्ना समितियों को तकनीकी रूप से मजबूत बनाया गया।
वहीं दूसरे कार्यकाल (2012-2017) में विजय बहुगुणा और हरीश रावत की सरकारों ने 2012-13 में गन्ना मूल्य ₹250 से बढ़ाकर ₹285 प्रति क्विंटल किया, जो करीब 15 प्रतिशत की सीधी बढ़ोतरी थी। वर्ष 2013-14 में उत्तराखंड का गन्ना मूल्य उत्तर प्रदेश की दर (₹280) से भी ₹5 अधिक निर्धारित किया गया था।
पेराई सत्र से पहले गन्ना बेल्ट में सियासी तपिश
साल 2013 से 2015 के बीच हरीश रावत सरकार के दौरान चीनी मिलों को ₹350 करोड़ का ब्याजमुक्त ऋण पैकेज दिलाने की पहल हुई थी और खरीद कर व समिति कमीशन में छूट देकर किसानों का 14 दिनों के भीतर ₹240 का पहला भुगतान सुनिश्चित कराया गया था। बाकी भुगतान के लिए भी समयबद्ध चरण बनाए गए थे। अब आगामी पेराई सत्र और राज्य में बदलते सियासी समीकरणों के बीच गन्ना बेल्ट में बकाया भुगतान और समर्थन मूल्य को लेकर वार-पलटवार का यह दौर आने वाले दिनों में और तीखा होने के पूरे आसार हैं।









