ऋषिकेश, 03 मई 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रेल पहुंचाने का सपना अब धरातल पर उतरने के बेहद करीब है। सामरिक और सामजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण 125 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना के तहत आगामी 20 मई से पटरियां बिछाने का काम शुरू किया जाएगा। प्रोजेक्ट के इस महत्वपूर्ण चरण की शुरुआत शिवपुरी से गूलर के बीच लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर ट्रैक बिछाने के साथ होगी।
9 साल बाद ट्रैक निर्माण का श्रीगणेश
वर्ष 2017 में इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू हुआ था। इसके तीन साल बाद 2020 में वीरभद्र से योगनगरी ऋषिकेश के बीच रेल लाइन बिछाई गई थी, लेकिन ऋषिकेश से आगे दुर्गम पहाड़ों के बीच ट्रैक बिछाने का काम अब 9 साल बाद शुरू होने जा रहा है।
रेल विकास निगम (RVNL) के अनुसार, शिवपुरी-गूलर (टनल 2) के बाद अगला लक्ष्य गूलर-व्यासी (टनल 3) के बीच ट्रैक बिछाना है। इस पूरे रेल नेटवर्क पर पटरियां बिछाने में करीब ढाई साल का समय और 750 करोड़ रुपये का अनुमानित खर्च आने की उम्मीद है।
यूरोपीय तकनीक से सुसज्जित होगा ट्रैक
पहाड़ों की संवेदनशीलता को देखते हुए इस रेल लाइन पर ‘ब्लास्ट-लेस’ तकनीक (बिना गिट्टी वाली पटरी) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह पूरी तरह से आरसीसी स्लैब पर आधारित तकनीक है, जो यूरोप, चीन और जापान जैसे देशों में हाई-स्पीड रेल नेटवर्क के लिए उपयोग की जाती है।
रेल विकास निगम के डीजीएम ओमप्रकाश मालगुडी ने पुष्टि की है कि ट्रैक डिजाइनिंग और स्थान सर्वेक्षण का कार्य पूरा हो चुका है। इस कार्य में इरकॉन इंटरनेशनल के साथ पारस और पीसीएम कंपनियां सहयोग कर रही हैं।
सुरंग निर्माण अंतिम चरण में
परियोजना का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा सुरंग निर्माण था, जो अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। मुख्य और एस्केप सुरंगों को मिलाकर कुल 213 किलोमीटर में से 207 किलोमीटर की खुदाई पूरी हो चुकी है। मुख्य सुरंग की बात करें तो 105 किलोमीटर में से केवल 3 किलोमीटर का काम शेष है, जिसे इसी वर्ष पूरा कर लिया जाएगा। अधिकांश सुरंगों में फाइनल लाइनिंग का काम भी संपन्न हो चुका है, जिससे अब ट्रैक बिछाने का रास्ता साफ हो गया है।
141 साल का इंतजार और आधुनिक इंजीनियरिंग
उत्तराखंड के पहाड़ों में रेल पहुंचाने की पहली कोशिश ब्रिटिश काल में 1885 में हुई थी। इसके बाद 1923-24 में भी प्रयास हुए, लेकिन तब की तकनीक और संसाधनों की कमी के कारण पहाड़ों को काटना असंभव माना गया।
अब आधुनिक इंजीनियरिंग के जरिए उसी असंभव को संभव बनाया जा रहा है। यह राज्य के इतिहास में पहला मौका होगा जब इतने ऊंचे और खड़े पहाड़ों के बीच रेल दौड़ेगी।









