---Advertisement---

Sitarganj Vigilance Controversy : कांग्रेस ने धामी सरकार को घेरा, जीरो गवर्नेंस का लगाया सीधा आरोप

---Advertisement---

देहरादून, 2 जुलाई 2026 (दून हॉराइज़न)।

Sitarganj Vigilance Controversy : उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों एक अनोखे और तीखे विवाद की जद में आ चुकी है। सितारगंज तहसील परिसर के भीतर विजिलेंस और राजस्व विभाग के बीच मचे घमासान ने राजनीतिक पारा पूरी तरह से गरमा दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि यह मामला सामान्य नहीं बल्कि राज्य की नौकरशाही में भारी समन्वयहीनता का जीता-जागता प्रमाण है।

विजिलेंस विभाग ने हाल ही में एक संग्रह अमीन और एक वरिष्ठ सहायक को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। इस कार्रवाई के बाद से महकमे में हड़कंप मचा हुआ है और प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है।

दूसरी तरफ गिरफ्तारियों के तुरंत बाद पूरा राजस्व विभाग विजिलेंस की इस कार्रवाई के खिलाफ खुलकर मैदान में उतर आया है। राजस्व कर्मियों का दावा है कि पकड़ी गई कुल धनराशि किसी भी प्रकार की रिश्वत नहीं थी, बल्कि यह वैध रूप से सरकारी राजस्व और केसीसी ऋण की वसूली की रकम थी।

सरकार के अंदरूनी विभागों के इन आमने-सामने के बयानों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि जब शासन के दो अहम अंग एक-दूसरे के दावों को सीधे तौर पर काट रहे हैं, तो जनता किस पर भरोसा करे।

मुख्यमंत्री हर सार्वजनिक मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का पुरजोर दावा करते आए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उनके अपने ही महकमे एक-दूसरे की प्रामाणिकता और ईमानदारी पर संदेह जता रहे हैं।

इस पूरी स्थिति को आड़े हाथों लेते हुए कांग्रेस प्रवक्ता ने इसे जीरो टॉलरेंस के बिल्कुल विपरीत जीरो गवर्नेंस करार दिया है। उनका तर्क है कि या तो विजिलेंस की कार्रवाई पूरी तरह फर्जी और भ्रामक है, या फिर राजस्व विभाग भ्रष्ट कर्मचारियों को बचाने के लिए लामबंद हो रहा है।

यदि विजिलेंस की कार्रवाई कानूनी रूप से सौ फीसदी सही है, तो सरकार को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि उसके महकमों में भ्रष्टाचार इस खतरनाक स्तर तक कैसे पहुंच गया। और अगर राजस्व विभाग का यह दावा सही है कि कर्मचारियों को फंसाया गया है, तो इस ज्यादती की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

यह पूरा विवाद केवल दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक सीमित रहकर खत्म होने वाला नहीं है। यह सीधे तौर पर शासन चलाने वालों की कार्यकुशलता और आपसी तालमेल की पोल खोल रहा है।

ऐसी विरोधाभासी परिस्थितियों के बीच आम जनता का शासन और प्रशासन तंत्र से धीरे-धीरे विश्वास उठना पूरी तरह स्वाभाविक है। जनता समझ नहीं पा रही है कि आखिर इस अंदरूनी खींचतान के पीछे असली सच्चाई क्या है।

कांग्रेस पार्टी ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट करते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार में लिप्त किसी भी व्यक्ति को किसी भी कीमत पर बचाया नहीं जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही यदि किसी निर्दोष सरकारी कर्मचारी को बिना पुख्ता आधार के बलि का बकरा बनाया गया है, तो कार्रवाई उन अधिकारियों पर भी होनी चाहिए जिन्होंने ऐसा किया।

इन तमाम अनिश्चितताओं और अंतर्विरोधों के बीच एक उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और पूरी तरह समयबद्ध जांच की मांग पुरजोर तरीके से उठाई जा रही है। जांच का दायरा ऐसा होना चाहिए जो दूध का दूध और पानी का पानी अलग कर सके।

उत्तराखंड के आम नागरिकों को केवल कागजी नारों और झूठे प्रचारों की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें एक पारदर्शी, जवाबदेह और पूरी तरह विश्वसनीय शासन की दरकार है।

धामी सरकार के लिए अब यह अनिवार्य हो गया है कि वह इस मामले पर अपनी चुप्पी तोड़े और स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करे। सरकार को राज्य की जनता को यह बताना ही होगा कि उसके दो प्रमुख विभाग आखिर क्यों एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं।

यह भी पढ़ें : केदारनाथ पैदल मार्ग पर भारी भूस्खलन, गौरीकुंड के पास रास्ता पूरी तरह बंद

Join WhatsApp

Join Now
---Advertisement---

Leave a Comment