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रिटायर्ड अफसरों के सेवा विस्तार पर रोक लगे नहीं तो होगा आंदोलन, देहरादून में वकीलों की दो टूक

देहरादून जिला न्यायालय में ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन ने राजस्व अदालतों में न्यायिक मजिस्ट्रेट बैठाने, एआईबीई रद्द करने और प्रोटेक्शन एक्ट की मांग पर आंदोलन छेड़ा।

देहरादून (25 अक्टूबर) : उत्तराखंड की तहसीलों और जिला राजस्व अदालतों में सालों से धूल फांक रही मुकदमों की फाइलों और प्रशासनिक अफसरों की कार्यप्रणाली के खिलाफ वकीलों ने खुली बगावत का बिगुल फूंक दिया है। देहरादून जिला न्यायालय परिसर में रविवार को आयोजित ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन (AILU) के दूसरे जिला सम्मेलन में मांग उठाई गई कि राजस्व मामलों से प्रशासनिक अफसरों को बेदखल कर तहसील स्तर पर न्यायिक तहसीलदार और जिला स्तर पर न्यायिक एसडीएम की नियुक्ति की जाए।

यूनियन ने साफ चेतावनी दी है कि यदि राजस्व अदालतों की व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव, ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) को समाप्त करने और एडवोकेट वेलफेयर एवं प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने की मांगें न मानी गईं, तो पूरे राज्य में व्यापक आंदोलन छेड़ा जाएगा।

राजस्व अदालतों से प्रशासनिक दखल हटाने की मांग

सम्मेलन जिला अदालत परिसर स्थित एडवोकेट संतोष श्रीवास्तव मंच और एडवोकेट शार्दुल पंवार भवन में आयोजित हुआ। सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में पहुंचे बार एसोसिएशन देहरादून के पूर्व उपाध्यक्ष और उत्तराखंड AILU के राज्य सचिव एडवोकेट शंभू प्रसाद मंगाई ने राजस्व अदालतों के मौजूदा ढांचे पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राजस्व अदालतों में प्रशासनिक जिम्मेदारियों में उलझे अधिकारियों के पास अदालती मामलों के लिए समय नहीं बचता, जिससे लाखों वादकारी और काश्तकार वर्षों तक तारीखों के चक्कर काटने को मजबूर रहते हैं।

यूनियन ने प्रस्ताव पारित किया कि तहसील में न्यायिक तहसीलदार, जिले में न्यायिक एसडीएम और राज्य स्तर पर न्यायिक आयुक्त की अलग से नियुक्ति की जाए। इसके साथ ही राजस्व न्यायालयों की तीन सदस्यीय व्यवस्था में सेवानिवृत्त प्रशासनिक अफसरों को बैठाने की परिपाटी समाप्त कर अधिवक्ताओं को सदस्य बनाने की पुरजोर वकालत की गई। मुख्य अतिथि व बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड की पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट रजिया बाग ने भी इसका समर्थन करते हुए न्यायिक कार्यों को पूरी तरह प्रशिक्षित विधिक हाथों में सौंपने की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रशासनिक व्यवस्था में अटके मुकदमे और कानूनी पेच

सम्मेलन में देश और राज्य की न्यायिक प्रणाली में मुकदमों के बढ़ते अंबार और नियुक्तियों में हीलाहवाली को विवाद की असली जड़ बताया गया। यूनियन के पदाधिकारियों ने सेवानिवृत्त न्यायिक व प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों को सेवा विस्तार दिए जाने की नीति का पुरजोर विरोध किया। उनका कहना था कि सेवा विस्तार देकर युवाओं के रोजगार के अवसर छीने जा रहे हैं, जबकि इन पदों पर तत्काल नई नियुक्तियां की जानी चाहिए। AILU ने न्यायिक आयोग 1975 की सिफारिशों को लागू करने की मांग दोहराई, जिसमें प्रति 10 लाख आबादी पर 110 न्यायाधीशों की तैनाती की बात कही गई थी।

वक्ताओं ने रेखांकित किया कि देशभर की अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं और उत्तराखंड के दूरदराज इलाकों में भी स्थिति चिंताजनक है। जजों की कमी और लचर व्यवस्था के कारण न्याय मिलने में दशकों लग रहे हैं। इसके अतिरिक्त, वकीलों ने ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) की उपयोगिता पर सवाल खड़े करते हुए इसे लॉ ग्रेजुएट्स पर बेवजह का वित्तीय व मानसिक बोझ बताया और इसे तुरंत समाप्त करने की मांग उठाई।

एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट और स्टाइपेंड पर आंदोलन की तैयारी

अधिवक्ताओं के कल्याण और सामाजिक सुरक्षा को लेकर यूनियन ने सरकार से उत्तराखंड में तत्काल एडवोकेट वेलफेयर एवं प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने का प्रस्ताव पास किया। यूनियन की मांग है कि 40 साल की वकालत पूरी करने के बाद रिटायर होने वाले अधिवक्ताओं या आकस्मिक मृत्यु पर आश्रितों को 20 लाख रुपये का एकमुश्त सुरक्षा फंड दिया जाए।

इसके अलावा गंभीर बीमारी के इलाज के लिए 5 लाख रुपये की सहायता और नए प्रैक्टिस में आने वाले जूनियर वकीलों को शुरुआती पांच वर्षों तक 5 हजार रुपये मासिक स्टाइपेंड की कानूनी गारंटी दी जाए। प्रत्येक वकील के लिए न्यायालय परिसर में निशुल्क चैंबर उपलब्ध कराने की मांग भी रखी गई।

सम्मेलन के समापन पर संगठनात्मक विस्तार करते हुए नई जिला कार्यकारिणी का निर्विरोध चुनाव किया गया। इसमें अब्दुल रऊफ को जिला अध्यक्ष और अनुराधा मैन्दोला को जिला सचिव चुना गया। नरेंद्र कुमार व अनिल कुमार को उपाध्यक्ष, महेश सती, सतीश कुमार व तबिश फिरदोस को सह सचिव तथा जसविंदर लूथरा को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई।

कार्यकारिणी सदस्य के रूप में रवीना लिंगवाल, हिमांशु खाती, जबर सिंह नेगी, सोनाली नेगी और हसीन अहमद को शामिल किया गया। वहीं, संरक्षक मंडल में अशोक कटारिया, दिलीप चंद, शंभू प्रसाद मंगाई, रंजन सोलंकी और मानसिंह शामिल किए गए। नई कार्यकारिणी ने संकल्प लिया कि वकीलों के हकों और न्यायिक सुधारों के लिए वे आंदोलन की रूपरेखा तैयार करेंगे।

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