देहरादून, 22 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक खेती और लुप्त होते बीजों को बचाने के लिए ग्राम्य विकास विभाग ने एक व्यापक रणनीति तैयार की है। विभाग अब चमोली जिले के छह ब्लॉकों—दशोली, गैरसैंण, नंदानगर, नारायणबगड़, देवाल और कर्णप्रयाग—के 70 गांवों में ‘Uttarakhand Seed Bank’ स्थापित करने जा रहा है। इस पहल के तहत 960 परिवारों को चिन्हित किया गया है, जो स्थानीय बीजों के संरक्षण और उत्पादन का कार्य करेंगे।
ग्राम्य विकास सचिव धीराज सिंह गर्ब्याल के अनुसार, इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य फसल विविधता को सुरक्षित करना और जलवायु परिवर्तन के बीच खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस परियोजना की एक खास बात यह है कि इसमें उत्तराखंड की उस प्राचीन परंपरा को आधार बनाया गया है, जिसमें दुल्हन अपने मायके से बीज और अनाज लेकर ससुराल आती थी। सदियों पुरानी इस बीज विनिमय व्यवस्था को अब आधुनिक स्वरूप में सीड बैंक के जरिए पुनर्जीवित किया जाएगा।
आजीविका और पिरूल संग्रहण पर जोर
खेती के साथ-साथ सरकार ने जंगलों में आग का कारण बनने वाले पिरूल (चीड़ की सूखी पत्तियां) को भी कमाई का जरिया बनाने के निर्देश दिए हैं। सचिव गर्ब्याल ने सभी जिलों के मुख्य विकास अधिकारियों (CDO) को 15 दिन के भीतर पिरूल संग्रहण की विस्तृत कार्ययोजना सौंपने को कहा है। योजना के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों और क्लस्टर स्तरीय संघों (CLF) को पिरूल इकट्ठा करने के काम से जोड़ा जाएगा, जिसके लिए उन्हें 10 रुपये प्रति किलो की दर से भुगतान किया जाएगा।
वित्तीय लाभ और भागीदारी
कम्युनिटी सीड बैंक परियोजना के तहत करीब 317 हेक्टेयर क्षेत्र में लाल चावल, मंडुवा, झंगोरा, राजमा, सोयाबीन, काला भट्ट और जौ जैसी पारंपरिक फसलों का बीज उत्पादन किया जाएगा।
- लागत और आय: योजना में प्रति हेक्टेयर 25 हजार रुपये की लागत तय की गई है, जबकि किसानों को इससे 75 हजार से 1 लाख रुपये तक की शुद्ध आय होने का अनुमान है।
- सामाजिक भागीदारी: चयनित गांवों में 50 प्रतिशत महिलाओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति और जनजाति परिवारों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
दो साल की अवधि वाली इस परियोजना में बीज संकलन से लेकर उनके प्रसंस्करण (Processing) और विपणन (Marketing) की पूरी व्यवस्था विकसित की जाएगी। इसके लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPO) की भी मदद ली जाएगी। पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के आधार पर इस मॉडल को वर्षा आधारित कृषि के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है।
परियोजना का स्वरूप और अपेक्षित लाभ
| विवरण | लक्ष्य/आंकड़े |
| लक्षित जिले/गांव | चमोली (70 गांव) |
| प्रमुख फसलें | लाल चावल, मंडुवा, झंगोरा, काला भट्ट, राजमा |
| अनुमानित शुद्ध आय | ₹75,000 – ₹1,00,000 प्रति हेक्टेयर |
| पिरूल संग्रहण दर | ₹10 प्रति किलोग्राम |
| वन क्षेत्र (चीड़) | उत्तराखंड का लगभग 16.36% भाग |









