दून हॉराइज़न, हरिद्वार (12 सितंबर) : योग गुरु बाबा रामदेव के एक नए वायरल वीडियो ने मेडिकल और वेलनेस जगत में नई बहस छेड़ दी है। वीडियो में वे तंबाकू और कृत्रिम निकोटीन फ्लेवर से मुक्त एक कथित ‘आयुर्वेदिक हुक्का’ (Baba Ramdev Ayurvedic Hookah) तैयार करने की विधि साझा करते दिख रहे हैं।
उनका दावा है कि इस तरीके से निकलने वाला औषधीय धुआं शरीर में वात, पित्त और कफ यानी त्रिदोष को संतुलित करता है और बंद नाक व जकड़ी हुई छाती में तुरंत आराम पहुंचाता है। इंटरनेट पर कुछ लोग इसे पारंपरिक भारतीय चिकित्सा का नायाब नुस्खा बता रहे हैं, तो आधुनिक चिकित्सा जगत के डॉक्टर इसे श्वसन तंत्र के लिए सीधा खतरा मान रहे हैं।
कैसे तैयार होता है यह मिश्रण और क्या हैं दावे?
वायरल क्लिप के अनुसार, इस मिश्रण को तैयार करने के लिए छह मुख्य सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। इसमें दरदरी कुटी हुई मुलेठी, गाय का शुद्ध घी, राई, हल्दी, देसी कपूर और काकड़ा सिंगी शामिल हैं।
विधि के मुताबिक, मुलेठी में घी, हल्दी और राई मिलाकर हुक्के की चिलम या प्लेट पर रखा जाता है। इसके बाद जलते हुए कपूर पर काकड़ा सिंगी डालकर उससे उठने वाली वाष्प या धुएं को हुक्के की नली के जरिए इनहेल करने की सलाह दी गई है। दावा किया गया है कि यह धुआं फेफड़ों में जमे कफ को पिघलाकर बाहर निकाल देता है।
फेफड़ों पर धुएं का असर: आधुनिक मेडिसिन क्या कहती है?
आधुनिक पल्मोनोलॉजी (श्वसन रोग विज्ञान) के जानकारों का रुख इस नुस्खे पर बेहद सख्त है। मेडिकल विशेषज्ञों का साफ कहना है कि फेफड़े केवल स्वच्छ हवा यानी ऑक्सीजन लेने के लिए बने हैं, किसी भी तरह के धुएं को फिल्टर करने के लिए नहीं।
जब किसी भी कार्बनिक पदार्थ या जड़ी-बूटी को सीधे जलाया जाता है, तो उसमें से पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5) और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे सूक्ष्म कण निकलते हैं।
चेस्ट फिजिशियन चेतावनी देते हैं कि अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या सीओपीडी (COPD) जैसी बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति यदि ऐसा धुआं सांस के जरिए अंदर खींचता है, तो उसकी सांस नलियों में अचानक सूजन आ सकती है। इससे ‘ब्रोंकोस्पाज्म’ (सांस नली का सिकुड़ना) होने का गंभीर जोखिम रहता है, जिससे मरीज को सांस लेने में भारी तकलीफ हो सकती है।
आयुर्वेद का ‘धूमपान’ बनाम घरेलू हुक्का प्रयोग
आयुर्वेद संहिताओं, खासकर चरक संहिता में ‘धूमपान’ (Ayurvedic Dhumapana) का उल्लेख जरूर मिलता है, लेकिन वह खुलेआम हुक्का पीने जैसा कतई नहीं है। जानकारों के मुताबिक, शास्त्रीय धूमपान एक अत्यंत नियंत्रित पंचकर्म प्रक्रिया है, जिसमें ‘धूमनेत्र’ नामक एक खास नलिका से निश्चित मात्रा में औषधीय धूप दी जाती है।
इसे हर किसी मरीज पर आजमाया नहीं जा सकता; इसके लिए व्यक्ति की प्रकृति, उम्र और रोग की अवस्था का सटीक परीक्षण अनिवार्य होता है। किसी वायरल वीडियो को देखकर घर पर हुक्का सुलगाना और धुएं को सीधे फेफड़ों में उतारना आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों के भी उलट माना जा सकता है।
यही वजह है कि मौसमी जुकाम या कफ की समस्या होने पर सोशल मीडिया के ऐसे प्रयोगों से दूर रहना ही बेहतर है। भाप (स्टीम इनहेलेशन) लेना या गुनगुने पानी का सेवन बिना किसी दुष्प्रभाव के राहत दे सकता है, जबकि धुएं से जुड़ा कोई भी अनियंत्रित प्रयोग जोखिम भरा साबित हो सकता है।









