देहरादून, 27 मई (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड में लगातार सुलग रहे जंगलों को बचाने और वनाग्नि की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाने के लिए वन विभाग एक नई प्रोत्साहन योजना शुरू करने जा रहा है। इस योजना के तहत फायर सीजन की समाप्ति के बाद हर जिले में आग रोकने के लिए उत्कृष्ट कार्य करने वाले वनकर्मियों, स्थानीय स्वयं सहायता समूहों और आम नागरिकों को पुरस्कृत किया जाएगा।
इसके तहत पहला पुरस्कार 1 लाख रुपये, दूसरा 75 हजार रुपये और तीसरा पुरस्कार 50 हजार रुपये तय किया गया है। वन मुख्यालय में वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस नई रणनीति की घोषणा की है, जिसका आधिकारिक प्रस्ताव जल्द ही शासन को मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।
जंगलों में पानी के लिए लगेंगे हाइड्रेंट, पिरूल कलेक्शन का लक्ष्य तय
वन मंत्री सुबोध उनियाल के मुताबिक, वनाग्नि की त्वरित रोकथाम के लिए जंगलों के बीच से गुजरने वाली सभी पेयजल लाइनों पर विशेष हाइड्रेंट स्थापित किए जाएंगे। इससे आग लगने की स्थिति में वन विभाग की टीमों को मौके पर तुरंत पानी मिल सकेगा।
इसके अतिरिक्त, जंगलों में जमा होने वाले अत्यधिक ज्वलनशील चीड़ के पत्तों को साफ करने के लिए ‘चीड़ पिरूल संग्रह अभियान’ चलाया जा रहा है। इस सीजन में प्रदेश भर से 8,555 टन पिरूल जमा करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि जंगलों में आग फैलने वाले कारकों को कम किया जा सके।
जनता से सहयोग की अपील और FSI अलर्ट का सच
वन मंत्री ने स्पष्ट किया कि वनाग्नि को रोकने में स्थानीय जनता की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपील की कि कहीं भी आग दिखने पर लोग सोशल मीडिया के लिए वीडियो बनाने के बजाय तुरंत वन विभाग को सूचित करें और आग बुझाने में हाथ बंटाएं। भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) से मिलने वाले उपग्रह डेटा पर बात करते हुए उन्होंने एक महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया।
वन मंत्री ने बताया कि एफएसआई के फायर अलर्ट में कई बार खेतों और स्थानीय कूड़े की आग भी दर्ज हो जाती है। धरातलीय जांच में सामने आया है कि इन सैटेलाइट अलर्ट में से केवल 14 प्रतिशत मामले ही वास्तविक रूप से वनाग्नि के होते हैं।
संवेदनशील जिले और फायर वॉचर्स की सुरक्षा
मुख्य वन संरक्षक (CCF) वनाग्नि सुशांत पटनायक ने बताया कि इस साल वनाग्नि से निपटने के लिए मैदानी स्तर पर 5,625 फायर वॉचरों समेत करीब 6,000 वनकर्मियों को तैनात किया गया है। जोखिम को देखते हुए इन सभी का 10 लाख रुपये का सामूहिक दुर्घटना बीमा कराया गया है। साथ ही फील्ड स्टाफ को 7,145 विशेष फायर रोधी सूट और आधुनिक उपकरण दिए गए हैं। फॉरेस्ट फायर रिस्क जोनेशन मैपिंग के मुताबिक उत्तराखंड के 8 जिले सबसे ज्यादा संवेदनशील श्रेणी में हैं:
- अल्मोड़ा
- चमोली
- रुद्रप्रयाग
- पौड़ी
- टिहरी
- उत्तरकाशी
- नैनीताल
- पिथौरागढ़
चालू सीजन के आंकड़ों के मुताबिक, अब तक प्रदेश में वनाग्नि की 394 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिससे 331.12 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है।
देहरादून के किमाड़ी और रायपुर में रातभर चला रेस्क्यू
गर्मी का प्रकोप बढ़ने के साथ ही राजधानी देहरादून और आसपास के इलाकों में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। पिछले 24 घंटे के भीतर जिले के विभिन्न हिस्सों से आग लगने की 12 कॉल फायर ब्रिगेड को मिलीं। मुख्य अग्निशमन विभाग के अनुसार, इनमें से सबसे अधिक 7 घटनाएं देहरादून फायर स्टेशन क्षेत्र, 3 सेलाकुई और 2 विकासनगर क्षेत्र से सामने आईं।
मंगलवार देर शाम देहरादून के किमाड़ी और रायपुर के नजदीकी जंगलों में अचानक भीषण आग लग गई। मालसी रेंज की रेंजर शुचि चौहान ने बताया कि किमाड़ी क्षेत्र में आग की सूचना मिलते ही गश्ती दल तुरंत सक्रिय हुआ। इसके बाद वह खुद भी टीम के साथ मौके पर पहुंचीं। रेस्क्यू टीम के लीडर जितेंद्र बिष्ट की अगुवाई में वन विभाग और पुलिस ने करीब एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद किमाड़ी की आग पर काबू पाया।
मुख्य अग्निशमन अधिकारी के अनुसार, गर्मियों में शॉर्ट सर्किट और सूखी झाड़ियों में आग लगने की घटनाएं बढ़ती हैं, जिसके चलते सभी फायर स्टेशनों को हाई अलर्ट पर रखकर रिस्पॉन्स टाइम कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
जौनसार बावर के साहिया में फसल और चारा जलकर खाक
देहरादून जिले के पर्वतीय क्षेत्र साहिया के अंतर्गत साहिया-उदपाल्टा मोटर मार्ग पर स्थित नेवी गांव के पास कुरोली और बोहरी गांव के बीच मंगलवार को किसी अज्ञात व्यक्ति ने सड़क किनारे सूखी घास में आग लगा दी। इस आग ने देखते ही देखते विकराल रूप ले लिया और ग्रामीणों के खेतों तक पहुंच गई। ग्रामीणों ने रातभर प्रयास कर आग को बुझाया, लेकिन तब तक कई ग्रामीणों के आम के बगीचे और मवेशियों के लिए रखी गई सूखी चारा-पत्ती जलकर पूरी तरह राख हो गई।
चमोली के नारायणबगड़ में वन विभाग के दफ्तर के पास तक पहुंचीं लपटें
चमोली जिले से आ रही रिपोर्ट के मुताबिक, नारायणबगड़ क्षेत्र के चीड़ के जंगलों में पिछले तीन दिनों से भीषण आग धधक रही है, जिससे हजारों छोटे-बड़े पेड़-पौधे नष्ट हो चुके हैं और पूरी घाटी धुएं की चपेट में है। हैरान करने वाली बात यह है कि जहां एक तरफ वन संरक्षक डॉ. विनय भार्गव चमोली में वनाग्नि प्रबंधन की समीक्षा कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ नारायणबगड़ में सड़क किनारे चीड़ के पेड़ धू-धू कर जल रहे थे।
यह आग नारायणबगड़ स्थित वन विभाग के स्थानीय दफ्तर से महज 60 मीटर की दूरी पर थी और इसके ठीक ऊपर से 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन विद्युत लाइन गुजर रही है, जिससे इलाके में बड़ा खतरा बना हुआ है।









